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अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस (08 सितंबर) पर विशेष: सिर्फ हस्ताक्षर नहीं, अधिकार है साक्षरता

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सुनील कुमार महला

हर वर्ष 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। साक्षर का मतलब होता है -‘पढ़ने–लिखने में सक्षम व्यक्ति।‘ मतलब यह है कि जो व्यक्ति पढ़ और लिख सकता हो तथा लिखी हुई बात को समझ सकता हो,साक्षर कहलाता है।इस दिवस को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य शिक्षा और साक्षरता के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। कोई भी व्यक्ति हो, हर किसी को ज्ञान और सूचना से जोड़ने का माध्यम साक्षरता ही है। जब कोई व्यक्ति साक्षर होता है तो वह शिक्षा के माध्यम से ज्ञान और सूचनाएं प्राप्त कर सकता है और जब व्यक्ति के पास ज्ञान और सूचनाएं होतीं हैं, तो वह व्यक्ति न केवल अपने जीवन को बेहतर ढंग से जी सकता है, बल्कि शिक्षा के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक विकास में भी अपना महत्वपूर्ण और अहम् योगदान दे सकता है। सच तो यह है कि आज के युग में प्रत्येक व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुंच बहुत ही जरूरी हो गई है, क्यों कि एक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त व्यक्ति ही आज के एआइ तथा डिजिटल युग में डिजिटल साक्षरता, वित्तीय साक्षरता और सूचना की सही पहचान कर सकता है। वास्तव में आज जरूरत इस बात की है कि महिलाओं, बच्चोंऔरवंचितवर्गोंकोशिक्षाकेअवसरउपलब्धहों।

शिक्षा का मतलब केवल अक्षर ज्ञान नहीं:-

हमें यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि शिक्षा व्यक्ति को केवल और केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं देती है, बल्कि यह व्यक्ति विशेष को जीवन में आत्मनिर्भर, अधिक जागरूक और अधिकार–संपन्न भी बनाती है। यदि हमें किसी राष्ट्र को प्रगति के पथ पर अग्रसर करना है तो शिक्षा ही वह अनमोल रत्न है,जो उस राष्ट्र विशेष को प्रगति के पथ पर आगे ले जा सकता है। सरल शब्दों में कहें तो साक्षरता किसी राष्ट्र की प्रगति का पहला कदम है। जिस समाज में हर व्यक्ति पढ़ने, समझने और सही निर्णय लेने में सक्षम होता है, वहां गरीबी, भेदभाव और अज्ञानता को कम करने की संभावनाएं बढ़ती हैं। आज आवश्यकता केवल हर व्यक्ति को साक्षर बनाने की नहीं, बल्कि उसे जीवनोपयोगी, डिजिटल और ज्ञान–आधारित शिक्षा से जोड़ने की है। वास्तव में, एक साक्षर व्यक्ति स्वयं का भविष्य बदलता है और एक साक्षर समाज राष्ट्र का भविष्य बदल देता है।

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस का इतिहास:-

इस दिवस के इतिहास की यदि हम यहां पर बात करें तो पाठकों को बताता चलूं कि अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस की शुरुआत यूनेस्को की पहल से हुई। दरअसल, 26 अक्टूबर 1966 को यूनेस्को के 14वें आम सम्मेलन में 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया और इसके बाद पहला अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस 8 सितंबर 1967 को मनाया गया। तब से प्रत्येक वर्ष यह दिवस दुनिया भर में साक्षरता के महत्व और शिक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करता है। हालांकि, यह भी विवरण मिलता है कि 1965 में ईरान के तेहरान में आयोजित ‘विश्व शिक्षा मंत्रियों का सम्मेलन’  में साक्षरता के वैश्विक अभियान का प्रस्ताव रखा गया था। यह भी बहुत कम लोग जानते होंगे कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1990 को आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय साक्षरता वर्ष घोषित किया था। इसी वर्ष थाईलैंड के जोमटिएन में ऐतिहासिक ‘एजुकेशन फॉर ऑल‘  सम्मेलन हुआ, जिसने आधुनिक वैश्विक प्राथमिक शिक्षा की नींव रखी। यह भी उल्लेखनीय है कि साक्षरता को दीर्घकालिक गति देने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 2003 से 2012 तक एक पूरा दशक साक्षरता के नाम समर्पित किया था, जिसका नारा था-‘साक्षरता एक मुक्ति मार्ग‘।

भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन:-

पाठकों को बताता चलूं कि भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की शुरुआत 5 मई 1988 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा एक सामाजिक अभियान के रूप में की गई थी तथा इसका प्राथमिक लक्ष्य 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के निरक्षर व्यक्तियों को कार्यात्मक साक्षरता प्रदान कर आत्मनिर्भर बनाना था, जिसमें लाखों स्वयंसेवकों को जोड़कर इसे जन–आंदोलन का रूप दिया गया। इसने न केवल अक्षर ज्ञान और बुनियादी गणित सिखाया, बल्कि महिलाओं और वंचित वर्गों में अधिकारों व स्वास्थ्य के प्रति सजगता भी बढ़ाई। बहरहाल, यहां यह उल्लेखनीय है कि भारत में ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन‘ (1988) से लेकर वर्तमान ‘उल्लास – नव भारत साक्षरता कार्यक्रम‘ 2022–2027 के माध्यम से 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के गैर–साक्षरों को बुनियादी साक्षरता और जीवन कौशल से जोड़ा जा रहा है।भारत के संदर्भ में रूचिकर तथ्य है कि 4 फरवरी 1990 को केरल का एर्नाकुलम भारत का पहला 100% पूर्ण साक्षर जिला घोषित किया गया था तथा इस अभियान का नेतृत्व तत्कालीन कलेक्टर के.आर. राजन ने किया था, जिसमें 20,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने घर–घर जाकर 1.75 लाखनिरक्षरवयस्कोंकोअक्षरज्ञानदियाथा।

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस की थीम:-

बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस 2026 की थीम/विषय-‘लोगों, पृथ्वी और समृद्धि के लिए साक्षरता‘ रखा गया है। इस थीम का अर्थ यह है कि साक्षरता का मतलब केवल और केवल पढ़ना लिखने से नहीं होता है।बल्कि इसका तात्पर्य ऐसी शिक्षा प्राप्त करना है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर बना सके। वह समाज और देश की प्रगति में अपना योगदान दे सके और पर्यावरण की रक्षा के प्रति जागरूक हो सके। याद रखिए कि साक्षर और जागरूक नागरिक ही अपने लिए, समाज के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य बना सकते हैं।

अंत में यही कहूंगा कि साक्षरता केवल हस्ताक्षर करने का ही नाम नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा, आत्मनिर्णय और सामाजिक चेतना की कुंजी है। वास्तव में, शिक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक बुनियादी मानवाधिकार है, जो व्यक्ति को अपने अधिकारों, स्वास्थ्य और आजीविका के प्रति सजग बनाता है। आज के तकनीकी युग में साक्षरता का दायरा बुनियादी अक्षर ज्ञान से आगे बढ़कर डिजिटल, वित्तीय और कार्यात्मक दक्षता तक फैल चुका है। जब तक समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति–विशेषकर महिलाओं और वंचित वर्गों तक ज्ञान और सूचना की सहज पहुँच नहीं बनती, तब तक एक समतामूलक, आत्मनिर्भर और सशक्त राष्ट्र की कल्पना अधूरी ही रहेगी।

(लेखक फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार है)

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