चौथा अक्षर संवाददाता/ नई दिल्ली
विकासशील देशों के लिए अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली और दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने संयुक्त रूप से नई दिल्ली में इंडिया एंड इमर्जिंग इकोनॉमिक ऑर्डर फोरम (India and Emerging Economic Order Forum–IEOF) का शुभारंभ किया। इस फोरम की स्थापना वैश्विक अर्थव्यवस्था में हो रहे व्यापक परिवर्तनों पर सतत बौद्धिक एवं नीतिगत विमर्श के लिए एक मंच के रूप में की गई है। भारत के प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव एवं भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर श्री शक्तिकांत दास ने फोरम का औपचारिक शुभारंभ किया और “ग्लोबल साउथ: नई भू-आर्थिक व्यवस्था को आकार देने में भारत की भूमिका” विषय पर उद्घाटन संबोधन दिया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने की।
अपने मुख्य संबोधन में श्री दास ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था गहन भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक परिवर्तनों के दौर से गुजर रही है। उन्होंने दो प्रमुख परिवर्तनों को रेखांकित किया—वैश्विक आर्थिक गुरुत्वाकर्षण के केंद्र का पूर्व की ओर स्थानांतरण तथा ग्लोबल साउथ की लगातार बढ़ती आर्थिक और भू-राजनीतिक भूमिका। उन्होंने कहा कि ये परिवर्तन वैश्विक व्यापार एवं व्यवसाय को नया स्वरूप दे रहे हैं और आर्थिक सुधार एवं संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहे विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण अवसर उत्पन्न कर रहे हैं। इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए नए विचारों एवं रणनीतियों की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि IEOF सार्थक संवाद एवं निरंतर उच्च-गुणवत्ता वाले शोध के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।
ग्लोबल साउथ की बढ़ती आर्थिक शक्ति का उल्लेख करते हुए श्री दास ने कहा कि उभरती बाजार एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का कुल आर्थिक उत्पादन वर्ष 2000 में लगभग 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2025 में 48.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया। वर्तमान में ग्लोबल साउथ विश्व की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या और वैश्विक आर्थिक उत्पादन के लगभग 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत, वैश्विक वस्तु निर्यात में 46 प्रतिशत तथा वैश्विक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रवाह में 57 प्रतिशत है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विकासशील देशों ने गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। साथ ही, श्री दास ने आगाह किया कि ग्लोबल साउथ की विकास यात्रा अभी अधूरी है। विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ आज भी गरीबी, ऋण संबंधी जोखिम, बुनियादी ढाँचे की कमी, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा असुरक्षा, प्रौद्योगिकी तक असमान पहुँच तथा बढ़ती संरक्षणवादी प्रवृत्तियों जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। आगामी दशक में उभरती बाजार एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लगभग 1.2 अरब युवाओं के कामकाजी आयु वर्ग में प्रवेश करने की संभावना को देखते हुए निवेश और रोजगार सृजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होंगे। उन्होंने पाँच क्षेत्रों—खाद्य सुरक्षा, व्यापार विविधीकरण एवं वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भागीदारी, ऊर्जा संक्रमण, समष्टि आर्थिक स्थिरता और रोजगार सृजन—पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता बताई।
भारत के संदर्भ में श्री दास ने देश को अनिश्चित विश्व में एक उज्ज्वल केंद्र बताते हुए समष्टि आर्थिक एवं वित्तीय स्थिरता, संरचनात्मक सुधार, बुनियादी ढाँचे के निर्माण, औद्योगिक विकास और वैश्विक एकीकरण पर भारत के विशेष बल को रेखांकित किया। वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच भारत की औसत वार्षिक वास्तविक GDP वृद्धि दर 7.9 प्रतिशत रही, जबकि 2026-27 की पहली तिमाही में वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। उन्होंने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और अपतटीय अन्वेषण सहित विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे संरचनात्मक सुधारों और उभरती पहलों का भी उल्लेख किया।
ग्लोबल साउथ में भारत की भूमिका पर चर्चा करते हुए श्री दास ने भारत की विकास साझेदारियों, क्षमता निर्माण पहलों, रियायती वित्तपोषण तथा पारस्परिक रूप से लाभकारी सहयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों, किफायती दवाओं एवं टीकों, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, मानवीय सहायता और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में भारत के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं के बीच अधिक सहयोग से व्यापार, जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, आपूर्ति शृंखला एकीकरण और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार से संबंधित अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में उनकी सामूहिक आवाज़ को मजबूती मिल सकती है। IEOF के भावी एजेंडे की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए श्री दास ने छह प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की—आपूर्ति शृंखला एवं नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र; नीति एवं कार्यक्रम मूल्यांकन; जलवायु वित्त एवं आर्थिक सुदृढ़ता; शहरीकरण एवं अवसंरचना वित्त; स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण; तथा वित्तीय समावेशन। उन्होंने सफल विकास अनुभवों से देशों के बीच परस्पर सीखने की संभावनाओं पर भी बल दिया। इनमें भारत के आधार, यू पी आई और डिजी लॉकर, केन्या के एम पैसा M-Pesa तथा ब्राज़ील के सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों जैसे उदाहरण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि IEOF शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत के बीच साझेदारी को बढ़ावा देने तथा ग्लोबल साउथ में ज्ञान एवं सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इससे पूर्व प्रो. सचिन कुमार शर्मा, महानिदेशक, आर आई एस, ने स्वागत वक्तव्य दिया। प्रो. राम सिंह, निदेशक, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स; डॉ. शेषाद्रि चारी, सदस्य, गवर्निंग काउंसिल; तथा प्रो. योगेश सिंह, कुलपति, दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। फोरम के शुभारंभ के बाद “वैश्विक आर्थिक सहयोग का बदलता परिदृश्य” (The Evolving Landscape of Global Economic Cooperation) विषय पर एक पैनल चर्चा आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता प्रो. धनंजय सिंह, सदस्य सचिव, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद ने की।
पैनल में प्रो. सिमरित कौर, प्राचार्य, श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स; प्रो. अमिताभ मट्टू, डीन, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय; श्री अशोक के. भट्टाचार्य, संपादकीय निदेशक, बिजनेस स्टैंडर्ड; तथा डॉ. प्रबीर डे, प्रोफेसर, RIS ने भाग लिया। चर्चा में अर्थशास्त्र, अंतरराष्ट्रीय संबंध, मीडिया और नीति अनुसंधान के विविध दृष्टिकोणों से बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर विचार-विमर्श किया गया।






