श्याम लाल शर्मा/नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश कैडर की चर्चित पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने आख़िरकार अपना त्यागपत्र देने के बाद अब अपनी नई पारी शुरू करने का ऐलान कर दिया है. इस्तीफा देने के एक महीने बाद दिव्या मित्तल फिर एक बार अचानक सामने आई और एक वीडियो जारी कर स्पष्ट कर दिया कि वह राजनीति में आएंगी तो जरूर लेकिन किसी भी राजनीतिक दल में शामिल नहीं होंगी. दिव्या ने कहा है कि वह जनता के बीच रहकर और आम नागरिकों के साथ मिलकर एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच के जरिए काम करेंगी. कुछ ऐसे सवाल हैं जहां उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा होता है। आईएएस अधिकारी जिलों में निर्णय लेने, योजनाओं को जमीन पर उतारने और प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए तैयार किए जाते हैं। लेकिन, जब उनकी भूमिका लगातार सरकारी दफ्तरों तक सीमित होती जाती है या फैसलों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ता है तो प्रशासनिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन बिगड़ने की शिकायतें सामने आती हैं। कुछ यही वजह रही है जिसके चलते 13 साल की नौकरी के बाद दिव्या मित्तल ने राजनीति में उतरने का फैसला किया है.
उलेखनीय है दिव्या मित्तल मूल रूप से हरियाणा के रेवाड़ी की रहने वाली हैं. उन्होंने आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और इसके बाद आईआईएम बेंगलुरु से मैनेजमेंट की शिक्षा हासिल की. आईएएस बनने से पहले उन्होंने लंदन में नौकरी भी की थी. बाद में भारत लौटकर उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास की और 2013 बैच में भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल हुईं. उत्तर प्रदेश कैडर में उनकी पोस्टिंग के दौरान उन्होंने मेरठ में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट, गोंडा में मुख्य विकास अधिकारी, यूपीएसआईडीए में संयुक्त प्रबंध निदेशक और बरेली विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष जैसे पद संभाले. इसके बाद वह संत कबीर नगर, मिर्जापुर और देवरिया की जिलाधिकारी रहीं. 2026 में वह यूपी सरकार के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात थीं. मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान उन्हें उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अशोक बम्बावले पुरस्कार भी मिला था. दिव्या मित्तल की सबसे चर्चित प्रशासनिक पहलों में मिर्जापुर के एक दुर्गम पहाड़ी गांव लहुरियादह तक पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचाना शामिल है. रिपोर्टों के मुताबिक, गांव के लोग लंबे समय से टैंकर पर निर्भर थे और उनके कार्यकाल में वहां पाइप से पानी पहुंचाया गया. यही काम उनकी प्रशासनिक पहचान का एक प्रमुख हिस्सा बना. देवरिया में भी वह सरकारी योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने और प्रशासनिक फैसलों को लेकर चर्चा में रही थीं. यानी राजनीति में आने से पहले उनके पास सीधे जनता और जिला प्रशासन के साथ काम करने का करीब 13 साल का अनुभव है. अब दिव्या ने अपने वीडियो संदेश में साफ कहा है कि वह किसी राजनीतिक दल के झंडे के नीचे जाने के बजाय जनता के साथ मिलकर राजनीति का नया रास्ता तलाशना चाहती हैं. उनका यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं.
30 अगस्त 2026 को दिव्या मित्तल ने आई ए एस से इस्तीफा देने की घोषणा की थी. उस समय उन्होंने अपनी 13 साल की सेवा को याद करते हुए कहा था कि प्रशासनिक सफर में उन्होंने लोगों से बहुत कुछ सीखा. बाद में उनका इस्तीफा स्वीकार हो गया. उस वक्त उनके राजनीति में आने को लेकर अटकलें जरूर शुरू हुई थीं, लेकिन तत्काल उन्होंने राजनीति में आने की बात से इनकार किया था. सोशल मीडिया पर राहुल गांधी से मुलाकात और 2027 चुनाव से जोड़कर कई दावे भी किए गए, लेकिन उन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी. अब 29 सितंबर को उनके वीडियो संदेश ने तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है. अपने नए राजनीतिक संदेश में दिव्या मित्तल ने व्यवस्था, संविधान, नागरिक अधिकारों और आम लोगों की समस्याओं को प्रमुख मुद्दा बनाया है. उनका कहना है कि सरकारी व्यवस्था को भीतर से देखने के बाद उन्हें लगा कि केवल प्रशासनिक भूमिका में रहकर बदलाव की कुछ सीमाएं हैं. इसलिए अब वह जनता के बीच जाकर राजनीतिक बदलाव की कोशिश करना चाहती हैं. उन्होंने जाति, धर्म, पैसा और बाहुबल पर आधारित राजनीति के बजाय जनता की ताकत पर आधारित राजनीतिक मंच बनाने की बात कही है. फिलहाल उन्होंने खुद को किसी स्थापित राजनीतिक दल से जोड़ने के बजाय स्वतंत्र राजनीतिक पहल की बात की है. यही बात उनकी एंट्री को दूसरे दलों के लिए अलग तरह की चुनौती बनाती.
आईएएस और राजनीति में एक बड़ा फर्क है. प्रशासन में अधिकारी को संविधान, कानून, सरकारी नियम और संस्थागत व्यवस्था के भीतर निर्णय लेना होता है. राजनीति में सिर्फ किसी नीति का समर्थन करना पर्याप्त नहीं होता. नेता को जनता के बीच लगातार मौजूद रहना, संगठन खड़ा करना, चुनाव लड़ना, कार्यकर्ताओं को जोड़ना और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक भरोसा कायम करना पड़ता है. उनके पास प्रशासनिक अनुभव और सार्वजनिक पहचान है, लेकिन चुनावी राजनीति में संगठन, बूथ स्तर की मौजूदगी, संसाधन, स्थानीय नेतृत्व और लंबे समय तक जनता के बीच काम करने की क्षमता भी निर्णायक कारक होते हैं.
दिव्या मित्तल की राजनीति में एंट्री की तुलना दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसे उदाहरणों से की जा सकती है. लेकिन दोनों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं. केजरीवाल भी सरकारी व्यवस्था के भीतर से निकले थे और उन्होंने व्यवस्था में बदलाव को राजनीतिक अभियान का आधार बनाया था. बाद में उन्होंने आम आदमी पार्टी का गठन किया और दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे. दिव्या मित्तल फिलहाल किसी पार्टी के गठन या किसी स्थापित दल से जुड़ने के बजाय जनता के साथ राजनीतिक मंच बनाने की बात कर रही हैं. इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनका मॉडल आगे किस रूप में विकसित होगा.
दिव्या मित्तल ने अभी तक किसी दल के खिलाफ चुनावी मोर्चा घोषित नहीं किया है. इसलिए यह कहना कि उनकी एंट्री सीधे किसी एक पार्टी के वोट बैंक को नुकसान पहुंचाएगी, फिलहाल अनुमान होगा. लेकिन उनकी राजनीति अगर आगे बढ़ती है तो तीन तरह की राजनीतिक जगह में हलचल पैदा हो सकती है. पहली, शहरी और शिक्षित मतदाता, जो प्रशासनिक दक्षता, पारदर्शिता और नागरिक अधिकार जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं. दूसरी, युवा मतदाता, खासकर वे लोग जो रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही जैसे मुद्दों से सीधे जुड़े हैं. तीसरी, महिला नेतृत्व की नई राजनीति. एक पूर्व महिला आईएएस अधिकारी का सीधे चुनावी राजनीति में आना यूपी में महिला नेतृत्व के एक अलग तरह के प्रयोग को जन्म दे सकता है.
दिव्या मित्तल के इस्तीफे के समय ही समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को योगी सरकार पर राजनीतिक हमला करने के लिए इस्तेमाल किया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि उत्तर प्रदेश में ईमानदार अधिकारियों को काम नहीं करने दिया जा रहा और भ्रष्टाचार के कारण अधिकारी परेशान हैं. सरकार की ओर से इन आरोपों को स्वीकार किए जाने का कोई आधार इन रिपोर्टों में नहीं है. यानी दिव्या मित्तल की कहानी राजनीति में प्रवेश की घोषणा से पहले ही यूपी के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी थी.
करीब 10 मिनट के वीडियो संदेश में दिव्या मित्तल ने अपने इस्तीफे के बाद उठ रहे सवालों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उनके सामने सवाल था कि आगे क्या करना है, किसके साथ और कहां से शुरुआत करनी है। इसी क्रम में उन्होंने राजनीति में आने का फैसला बताया। उन्होंने अपने प्रशासनिक अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें ऐसे लोगों की आवाज बनना है, जिनकी बात किसी दफ्तर तक नहीं पहुंच पाती। उन्होंने यह भी कहा कि वह देश की आजादी के इतने वर्षों बाद भी लोगों के सामने मौजूद समस्याओं का हिसाब चाहती हैं।
दिव्या मित्तल ने ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पुल और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कई गांवों में अब भी सड़क और पुल की समस्या बनी हुई है और बारिश के दौरान कुछ इलाकों का संपर्क प्रभावित हो जाता है। उन्होंने खराब सड़कों और गड्ढों से होने वाली दुर्घटनाओं का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि प्रशासनिक अधिकारियों को इन समस्याओं और उनसे जुड़ी फाइलों की जानकारी होती है, लेकिन कई बार समस्या के समाधान के लिए जरूरी प्राथमिकता नहीं दिखाई जाती।
एक आईएएस अधिकारी को तैयार करने में वर्षों लगते हैं। जिला प्रशासन से लेकर सचिवालय तक अनुभव हासिल करने के बाद जब कोई अधिकारी समय से पहले व्यवस्था से बाहर होता है तो सरकार को उसका अनुभव और संस्थागत स्मृति दोनों गंवाने पड़ते हैं। यूपी में आईएएस अधिकारियों के इस्तीफे और वीआरएस को इसलिए सिर्फ व्यक्तिगत फैसलों की श्रृंखला मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। अलग-अलग मामलों की वजह भले अलग हो, लेकिन एक साथ इतने अधिकारियों का सेवा से बाहर होना प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर चल रहे बदलाव का संकेत जरूर है। सवाल अब यह नहीं है कि कितने अफसर जा चुके हैं, बल्कि यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बन रही हैं जिनमें अनुभवी अधिकारी उस सेवा को छोड़ना बेहतर समझ रहे हैं, जिसे पाने के लिए देश के लाखों युवा हर साल कठिन परीक्षा देते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यूपी जैसे विशाल राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका धीरे–धीरे राजनीतिक नेतृत्व के अधीन होती जा रही है? लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार का प्रशासन पर नियंत्रण स्वाभाविक है, लेकिन प्रशासनिक तंत्र की पेशेवर स्वतंत्रता भी उतनी ही जरूरी है।






