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एक अधिकारी ऐसा भी – आई.ए.एस. तुकाराम मुंढे के आयुक्त का पदभार संभालने के बाद से महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफ.डी.ए.) में हड़कंप

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श्याम लाल शर्मा/मुंबई

कोई भी सरकार किसी भी ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी को एक जगह टिकने नहीं देती लेकिन वह अधिकारी जहाँ भी जाता है वहां हड़कंप मचा देता है कुछ ऐसा ही हाल है आई.ए.एस. अधिकारी तुकाराम मुंढे का। वे जहाँ भी रहे बड़ी ही ईमानदारी के साथ कम किया।तुकाराम मुंढे को भारतीय प्रशासनिक सेवा में उनके कड़े फैसलों और नियमों के प्रति अटूट निष्ठा के लिए जाना जाता है, जिसके कारण उनके 21 साल के करियर में अब तक 25 बार तबादले हो चुके हैं।पिछले दिनों उनका तबादला जब महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफ.डी.ए.) के आयुक्त के रूप में हुआ तो इस नई जिम्मेदारी को संभालते ही उन्होंने स्पष्ट संदेश दे दिया था कि लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी ब्रांड या संस्थान को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह कितना भी बड़ा या रसूखदार क्यों न हो।जन स्वास्थ्य को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में मिलावटखोरों, अस्वच्छ तरीके से खाना बनाने वाले होटलों और प्रतिबंधित पदार्थों की बिक्री करने वालों के खिलाफ एक व्यापक और कड़ा अभियान छेड़ दिया है। उनकी इस ताबड़तोड़ और सख्त कार्यशैली ने खाद्य क्षेत्र में सक्रिय माफियाओं और नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यवसायियों के बीच भारी हड़कंप मचा दिया है।

उल्लेखनीय है कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफ.डी.ए.) के आयुक्त का पदभार सम्हालते ही शुरुआती तीन हफ्तों में ही नियमों के उल्लंघन को लेकर 235 एफ.आई.आर. दर्ज की गईं, 359 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 274 अवैध या अमानक तरीके से चल रहे प्रतिष्ठानों को पूरी तरह से सील कर दिया गया। इस पूरे राज्यव्यापी अभियान के दौरान अब तक लगभग 50 करोड़ रुपये मूल्य की असुरक्षित, दूषित और मिलावटी खाद्य सामग्री जब्त की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त, मुंढे के कार्यभार संभालने के बाद से अब तक लिए गए नमूनों में से 4,000 से अधिक खाद्य नमूने गुणवत्ता परीक्षण (क्वालिटी टेस्ट) में पूरी तरह से फेल पाए गए हैं, जो बाजार में बिकने वाली खाद्य सामग्रियों में व्यापक मिलावट की भयावह स्थिति को उजागर करता है। उनके अभियान के पहले ही महीने में प्रशासन ने राज्य में प्रतिबंधित गुटखा और पान मसाला के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए 34.66 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का अवैध स्टॉक जब्त कर नष्ट कर दिया था।तुकाराम मुंढे के इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव या राजनीतिक/प्रशासनिक दबाव आड़े नहीं आया है। कानून और जन स्वास्थ्य के मानक सभी के लिए समान हैं—इस सिद्धांत को धरातल पर उतारते हुए एफ.डी.ए. की टीमों ने न केवल निजी होटलों, बल्कि बड़े सरकारी और प्रतिष्ठित संस्थानों पर भी समान रूप से छापेमारी की है। इसकी एक बानगी तब देखने को मिली जब बांबे हाईकोर्ट कैंटीन में खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की बात सामने आई। हाई कोर्ट की टिप्पणियों के बाद, एफ.डी.ए. की टीम ने स्वयं बॉम्बे हाई कोर्ट की कैंटीन का औचक निरीक्षण किया। इस जांच के दौरान कैंटीन में दो बिना लाइसेंस के संचालित हो रहे अवैध किचन पाए गए, जिसके बाद तुरंत कार्रवाई करते हुए उन्हें बंद करने का नोटिस जारी किया गया। इसी प्रकार, देश के अग्रणी शैक्षणिक संस्थान आईआईटी बॉम्बे (आई.आई.टी.बॉम्बे ) की मेस में भी अस्वच्छता और खाद्य मानकों की अनदेखी पाए जाने पर एफडीए द्वारा कड़ी कार्रवाई की गई और नोटिस थमाया गया।

कमिश्नर तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में महाराष्ट्र एफ.डी.ए. द्वारा की गई कार्रवाइयों के आंकड़े इस अभियान की गंभीरता और व्यापकता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले लगभग तीन महीनों के भीतर पूरे राज्य में 3,100 से अधिक निरीक्षण (इन्स्पेक्शन्स) किए गए हैं। इस सघन जांच अभियान के दौरान जन स्वास्थ्य के लिए तत्काल खतरा पैदा करने वाले लगभग 165 प्रतिष्ठानों के लाइसेंस तुरंत प्रभाव से निलंबित (सस्पेंड) कर दिए गए, जबकि 750 से अधिक खाद्य प्रतिष्ठानों को अपनी व्यवस्थाओं में सुधार करने के लिए कड़े सुधार नोटिस जारी किए गए हैं। यदि केवल शुरुआती चरण की बात करें, तो 25 मई से 15 जून 2026 के बीच ही एफ.डी.ए. ने 360 से अधिक संदिग्ध ठिकानों पर छापे मारकर भारी अनियमितताएं उजागर की थीं। कमिश्नर तुकाराम मुंढे के इस अभियान में निजी क्षेत्र के बड़े और ऐतिहासिक ब्रांड भी अछूते नहीं रहे हैं। मुंबई के प्रसिद्ध ‘शालीमार होटल’ और दशकों पुराने लोकप्रिय आइसक्रीम पार्लर ‘के. रुस्तम  आइसक्रीम पार्लर ’ जैसी प्रतिष्ठित जगहों पर भी नियमों का गंभीर उल्लंघन और स्वच्छता मानकों की कमी पाए जाने पर उनके लाइसेंस तत्काल निलंबित कर दिए गए। इसके अलावा, फिल्म और धारावाहिकों की शूटिंग के दौरान कलाकारों और क्रू को परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज ने भी कमिश्नर मुंढे से संपर्क कर चिंताएं जताई थीं, जिसके बाद शूटिंग सेट्स की कैंटीनों पर भी नजर रखी जा रही है। इन कार्रवाइयों के डर से पूरे महाराष्ट्र के रेस्तरां और ढाबा संचालकों में खलबली मच गई है और कई संचालकों ने अपनी कमियों को छिपाने या सुधारने के लिए स्वेच्छा से कुछ समय के लिए अपने प्रतिष्ठान बंद कर साफ-सफाई और नवीनीकरण का कार्य शुरू कर दिया है।

बताया जाता है कमिश्नर मुंढे अपने कुछ दोस्तों के साथ एक रेस्तरां में सामान्य ग्राहक के रूप में खाना खाने गए थे। वहां जब उन्हें पनीर की एक डिश परोसी गई, तो उनकी खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञता और तीक्ष्ण नजरों ने तुरंत भांप लिया कि परोसा गया पनीर असली नहीं, बल्कि सिंथेटिक या नकली  है। उन्होंने तुरंत रेस्तरां प्रबंधन से पूछताछ की और वहां फूड लाइसेंस के प्रदर्शन तथा परोसे जाने वाले पानी की गुणवत्ता से जुड़े नियमों की भी जांच की। इस औचक निरीक्षण में गंभीर कमियां पाए जाने पर उन्होंने उक्त प्रतिष्ठान को नियमों का पालन करने के लिए केवल 24 घंटे का कड़ा समय दिया और सुधार न होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। इस घटना के बाद से स्थिति यह हो गई है कि महाराष्ट्र के किसी भी बड़े रेस्तरां में यदि ‘मुंढे’ नाम से कोई टेबल बुकिंग होती है, तो वहां का स्टाफ और प्रबंधन अत्यधिक सतर्क हो जाता है।

हालांकि इस तरह के अभियान के चलते खाद्य उद्योग और कुछ व्यापारिक संगठनों की ओर से यह आलोचना भी की जा रही है कि एफ.डी.ए. द्वारा सीधे लाइसेंस रद्द या निलंबित करने की कार्रवाई बहुत ज्यादा सख्त है और यह आनुपातिक  नहीं है। इन आलोचनाओं और आपत्तियों का बेहद तार्किक और कानूनी जवाब देते हुए कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने स्पष्ट किया है कि विभाग पूरी तरह से कानून और तय प्रक्रियाओं के दायरे में रहकर ही काम कर रहा है। एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने ‘खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006’  की ‘धारा 32’ का विशेष रूप से उल्लेख किया। मुंढे ने समझाया कि इस अधिनियम की धारा 32 के तहत यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि बाजार में बेचे जाने या परोसे जाने वाले किसी भी खाद्य पदार्थ से जन स्वास्थ्य को गंभीर खतरा या बीमारी होने की थोड़ी सी भी आशंका होती है, तो नामित अधिकारी  के पास उस प्रतिष्ठान का लाइसेंस तुरंत प्रभाव से निलंबित करने का पूर्ण अधिकार है। उन्होंने कहा कि जब बात करोड़ों नागरिकों और बच्चों की सेहत की हो, तो वहां किसी भी प्रकार का समझौता या ढिलाई बरतना सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन होगा।

मिलावटखोरी और अस्वच्छता के खिलाफ चल रही इस लड़ाई को भविष्यन्मुखी बनाने के लिए तुकाराम मुंढे ने बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। इसके तहत उन्होंने पूरे राज्य में ‘सेफ फूड फॉर एव्री चाइल्ड इन महाराष्ट्र’  नामक एक बेहद महत्वाकांक्षी अभियान की औपचारिक शुरुआत की है। इस अभियान के अंतर्गत राज्य के सभी स्कूलों, कॉलेजों, हॉस्टलों की मेस और सरकारी मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) प्रदाताओं के लिए बेहद कड़े और शून्य-सहनशीलता वाले नियम लागू किए गए हैं। नए नियमों के अनुसार, महाराष्ट्र में किसी भी स्कूल परिसर के भीतर और स्कूल के 50 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार के सॉफ्ट ड्रिंक्स, पैकेज्ड जंक फूड, अत्यधिक तैलीय स्नैक्स या सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। स्कूलों और कैंटीन संचालकों को कड़े निर्देश दिए गए हैं कि वे बच्चों को केवल पौष्टिक, स्वच्छ और प्राकृतिक खाद्य विकल्प ही उपलब्ध कराएं। बच्चों के पोषण का आधार माने जाने वाले दूध और दुग्ध उत्पादों में किसी भी प्रकार की मिलावट को रोकने के लिए दूध माफियाओं के खिलाफ भी क्रूर कार्रवाई की जा रही है, क्योंकि मुंढे का मानना है कि दूध केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं बल्कि बच्चों और मरीजों के जीवन का आधार है।

तुकाराम मुंढे की इस बेखौफ और नियमों से समझौता न करने वाली शैली के पीछे उनकी अपनी जीवन यात्रा और संघर्ष की बड़ी भूमिका रही है। महाराष्ट्र के बीड जिले के एक बेहद साधारण किसान परिवार में जन्मे तुकाराम मुंढे ने बचपन में अपने पिता के साथ खेतों में पसीना बहाया है और स्थानीय बाजारों में खुद सब्जियां तक बेची हैं। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने राजनीति विज्ञान में अपनी उच्च शिक्षा (एम.ए.) पूरी की और अपनी कड़ी मेहनत के बल पर प्रतिष्ठित संघ लोक सेवा आयोग (यू.पी.एस.सी.) की सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय स्तर पर 20वां रैंक हासिल कर वर्ष 2005 में आई.ए.एस. अधिकारी बने। उनके 21 साल के शानदार प्रशासनिक करियर में उन्हें जहां भी नियुक्त किया गया, चाहे वह जलना या सोलापुर के जिला कलेक्टर के रूप में हो, या नवी मुंबई, नासिक और नागपुर के नगर निगम आयुक्त के रूप में, उन्होंने हमेशा भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों पर कड़ा प्रहार किया। इसी कड़क अंदाज़ के कारण उन्हें राजनीतिक और व्यापारिक लॉबिंग के विरोध का सामना करना पड़ता है और बार-बार उनका तबादला कर दिया जाता है। हालांकि, तबादलों को लेकर मुंढे का दृष्टिकोण बेहद सकारात्मक है। उनका कहना है कि हर नया तबादला उन्हें एक नए क्षेत्र में जाकर जनता की सेवा करने और व्यवस्था को सुधारने का एक नया अवसर प्रदान करता है।

महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा को लेकर किए जा रहे इन अभूतपूर्व प्रयासों की गूंज अब राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई देने लगी है, जिसे मीडिया द्वारा ‘मुंढे प्रभाव’  का नाम दिया जा रहा है। महाराष्ट्र की इस कड़ी कार्रवाई से प्रेरणा लेते हुए देश के कई अन्य राज्यों ने भी अपने यहाँ खाद्य मिलावटखोरी के खिलाफ अभियानों को तेज कर दिया है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर नमूनों की जांच कर रिकॉर्ड संख्या में दोषसिद्धि दर्ज की गई है, मध्य प्रदेश में दूध में डिटर्जेंट मिलाने वाले और स्कूलों में खराब घी सप्लाई करने वालों पर शिकंजा कसा गया है, और उत्तर प्रदेश में मसालों में रंगीन चावल का पाउडर मिलाने वाली फैक्ट्रियों पर छापेमारी की गई है। हालांकि, इस व्यापक अभियान के सामने कई बुनियादी ढांचागत चुनौतियां भी हैं, जिनमें सबसे प्रमुख समस्या खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की भारी कमी है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 1.4 बिलियन की आबादी पर केवल 2,000 से 2,500 खाद्य सुरक्षा अधिकारी उपलब्ध हैं, जो यूरोपीय संघ की तुलना में बेहद कम है। इसके अतिरिक्त, उद्योग जगत की कुछ लॉबियों द्वारा कथित तौर पर करोड़ों रुपये का फंड बनाकर ईमानदार अधिकारियों के तबादले का दबाव बनाने की खबरें भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी रहती हैं।इन तमाम चुनौतियों और दबावों के बावजूद, महाराष्ट्र के आम नागरिकों और विशेष रूप से युवा पीढ़ी का कमिश्नर तुकाराम मुंढे को सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है। जनता का मानना है कि यदि खाद्य सुरक्षा और जन स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर ऐसे ही कड़े और ईमानदार प्रयास जारी रहे, तो आने वाले समय में देश को मिलावटखोरी के इस गंभीर अभिशाप से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सकेगी।

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