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गोबरधन योजना से गैस आयात बिल में 5 अरब डॉलर तक की कमी की उम्मीद, IBA ने बताया पूरा गणित ?

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भारत में ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए प्राकृतिक गैस का आयात लंबे समय से अर्थव्यवस्था पर दबाव डालता रहा है। ऐसे में गोबरधन योजना को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ-साथ देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। इंडियन बायोगैस एसोसिएशन (IBA) के अनुसार, अगर देश में उपलब्ध जैविक कचरे का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करके बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) तैयार किया जाए, तो आने वाले समय में भारत के गैस आयात बिल में करीब 5 अरब डॉलर तक की कमी लाई जा सकती है। यह अनुमान योजना के तहत जैविक कचरे से घरेलू स्तर पर ऊर्जा तैयार करने की संभावनाओं पर आधारित है। गोबरधन योजना का मुख्य उद्देश्य पशुओं के गोबर और अन्य जैविक कचरे को बेकार पदार्थ के बजाय उपयोगी संसाधन में बदलना है। गांवों में बड़ी मात्रा में उपलब्ध गोबर, कृषि अवशेष और दूसरे जैविक कचरे से बायोगैस तैयार की जा सकती है। इसके बाद तकनीकी प्रक्रिया के जरिए बायोगैस को शुद्ध करके CBG में बदला जा सकता है। CBG का इस्तेमाल कई जगहों पर प्राकृतिक गैस के विकल्प के तौर पर किया जा सकता है।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। प्राकृतिक गैस की घरेलू मांग बढ़ने के साथ आयात पर निर्भरता भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। IBA का मानना है कि यदि देश में CBG उत्पादन को तेजी से बढ़ाया जाए, तो प्राकृतिक गैस के आयात की जरूरत कुछ हद तक कम की जा सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। इस योजना का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि एक ही पहल से कचरा प्रबंधन, ऊर्जा उत्पादन और ग्रामीण रोजगार जैसी कई जरूरतों को एक साथ संबोधित किया जा सके। गांवों में स्थापित होने वाले बायोगैस और CBG प्लांट स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा कर सकते हैं, जबकि किसानों और पशुपालकों को गोबर तथा कृषि अवशेष से अतिरिक्त आय का अवसर मिल सकता है।

किसानों के लिए भी बन सकता है कमाई का जरिया ?

गोबरधन योजना का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने वाला है। किसानों और पशुपालकों के लिए गोबर एक अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकता है। इसके अलावा बायोगैस प्लांट से निकलने वाला जैविक अवशेष बेहतर गुणवत्ता वाले जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल सकती है।

CBG प्लांट लगाने, कच्चा माल जुटाने, परिवहन, प्लांट संचालन और तैयार गैस की आपूर्ति के लिए स्थानीय स्तर पर कई तरह के रोजगार पैदा हो सकते हैं। इससे ग्रामीण युवाओं को अपने क्षेत्र में ही काम के अवसर मिलने की संभावना बढ़ेगी। छोटे उद्यमियों के लिए भी कचरे से ऊर्जा बनाने का कारोबार एक नया बिजनेस मॉडल बन सकता है। जैविक कचरे का उचित प्रबंधन पर्यावरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। खुले में गोबर और कृषि अवशेष पड़े रहने से दुर्गंध और प्रदूषण जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इन्हीं संसाधनों को बायोगैस में बदलने से कचरे का बेहतर उपयोग संभव होगा। साथ ही जीवाश्म ईंधन की जगह नवीकरणीय गैस का इस्तेमाल बढ़ने से कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी योगदान मिल सकता है।

भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को मिल सकती है मजबूती ?

गोबरधन योजना को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्लांट, बेहतर सप्लाई चेन, तकनीक, निवेश और बाजार की जरूरत होगी। यदि इन क्षेत्रों में तेजी से काम किया जाता है तो बायोगैस और CBG भारत के ऊर्जा मिश्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। IBA का अनुमान इसी संभावित विस्तार की ओर संकेत करता है। गोबरधन योजना को केवल गोबर से गैस बनाने वाली योजना के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह ऊर्जा सुरक्षा, ग्रामीण आय, रोजगार, कृषि उत्पादकता, कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाली पहल बन सकती है। यदि देश में CBG उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ावा मिलता है, तो आने वाले वर्षों में गैस आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा में उल्लेखनीय बचत की संभावना बन सकती है।

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