चौथा अक्षर संवाददाता/ मुंबई
मुंबई। ‘मुंबई प्रेस क्लब‘ के द्विवार्षिक चुनाव में ‘सेव प्रेस क्लब अलायंस‘ (Save Press Club Alliance) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए लगभग सभी प्रमुख पदों पर अप्रत्याशित जीत दर्ज की है। इस चुनाव में अध्यक्ष पद से लेकर कोषाध्यक्ष और स्क्रूटनी कमेटी तक गठबंधन के उम्मीदवारों ने बाजी मारी। अध्यक्ष पद पर सुरेंद्र गांगण ने 579 मत हासिल कर जीत दर्ज की। वहीं, उनके प्रतिद्वंद्वी राजीव खांडेकर को 258 मत मिले, जबकि 22 मत अवैध घोषित किए गए।
चेयरमैन पद पर एस. बालकृष्णन ने 508 मत प्राप्त कर विजय हासिल की। उनके प्रतिद्वंद्वी मयुरेश गणपत्ये को 320 मत मिले।
उपाध्यक्ष पद पर पांडुरंग म्हस्के ने 537 मत हासिल कर जीत दर्ज की, जबकि आशिष राजे को 290 मत मिले। सचिव पद पर अनिल सिंह ने 513 मत प्राप्त कर जीत हासिल की। उनके मुकाबले सौरभ शर्मा को 313 मत मिले। ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर सुधाकर कश्यप ने 515 मत प्राप्त कर विजय हासिल की। उनके सामने ऋचा खानोलकर को 323 मत मिले। कोषाध्यक्ष पद पर ओ. पी. तिवारी ने 487 मत हासिल कर जीत दर्ज की, जबकि शशांक पराडे को 335 मत मिले।
वहीं, स्क्रूटनी कमेटी (2026-2028) के लिए ‘सेव प्रेस क्लब अलायंस’ के सभी उम्मीदवार विजयी रहे। प्रसाद काथे, विजय सिंह, नीलेश दवे और आलोक देशपांडे को 121-121 मत, जबकि दीपाली कदम को 120 मत प्राप्त हुए।
‘सेव प्रेस क्लब अलायंस‘ के प्रबंध समिति के सभी 10 सदस्यों ने भी अपने प्रतिद्वंदियों को बुरी तरह से हरा दिया है। इस चुनाव परिणाम के साथ ‘सेव प्रेस क्लब अलायंस’ ने मुंबई प्रेस क्लब की नई कार्यकारिणी और स्क्रूटनी कमेटी पर अपना मजबूत वर्चस्व स्थापित कर लिया। जिसमें परब वैभव को 530 मत मिले, शिंदे स्वप्नील ए. 502 मत, अपराज पूनम डी. 494 मत, रेगे मनीषा एम. 491मत, शुक्ला अनीता डी. 474 मत, अन्सारी शाहिद ए. 449 मत, दुबे आदित्य आर. 427 मत, नैनन मधू ए. 396 मत, बेन्नीचन के. जे. 387 मत, गोस्वामी उमेश डी. को 380 मत मिले।

मुंबई प्रेस क्लब का चुनाव इस बार सामान्य चुनाव नहीं है। यह किसी अध्यक्ष, सचिव या कार्यकारिणी सदस्य के चयन तक सीमित नहीं है। यह चुनाव उस संस्था के भविष्य का चुनाव है, जिसे पत्रकारों ने कई दशक की मेहनत, वैचारिक प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक परंपराओं से खड़ा किया है। यह चुनाव तय करेगा कि आने वाले वर्षों में मुंबई प्रेस क्लब की चाल, चरित्र और चेहरा कैसा होगा।
मुंबई प्रेस क्लब केवल एक इमारत नहीं है। यह पत्रकारों का साझा घर है। यह वह स्थान है, जहां विचारधाराएं टकराती नहीं, संवाद करती हैं; जहां मतभेद दुश्मनी में नहीं बदलते, बल्कि विमर्श का आधार बनते हैं; जहां प्रिंट, टीवी, डिजिटल, फोटो, स्वतंत्र और वरिष्ठ पत्रकार समान सम्मान के साथ बैठते हैं। प्रेस क्लब की असली ताक़त उसकी दीवारों में नहीं, बल्कि उसके लोकतांत्रिक संस्कारों में रही है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पिछले कुछ वर्षों में इस वातावरण पर धुंध छाई है। संवाद की जगह अविश्वास ने ली, सहमति की जगह गुटबाज़ी ने और लोकतांत्रिक संस्कृति की जगह व्यक्तिगत टकरावों ने। परिणाम यह हुआ कि प्रेस क्लब की वह गरिमा, जिस पर पत्रकार समुदाय गर्व करता था, धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई।लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का दावा करने वाला मीडिया यदि स्वयं अपने संस्थानों में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा न कर सके, तो उसकी नैतिक शक्ति भी कमजोर पड़ जाती है। हम विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से जवाबदेही की अपेक्षा करते हैं। हम पुलिस, नौकरशाही और राजनीतिक दलों की भाषा और आचरण पर सवाल उठाते हैं। ऐसे में सबसे पहला प्रश्न हमें स्वयं से पूछना चाहिए, “क्या हम अपने संस्थानों में वही मूल्य लागू कर रहे हैं जिनकी अपेक्षा हम दूसरों से करते हैं?”
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि 25 अक्टूबर 2025 को मुंबई प्रेस क्लब में अध्यक्ष समर खडस ने टीवी पत्रकार राजेश कुमार और दूसरे कैमरामैन के साथ जो कुछ किया, उसने पत्रकार बिरादरी को भीतर तक विचलित कर दिया। सार्वजनिक मंच पर गाली-गलौज की भाषा के प्रयोग ने केवल कुछ व्यक्तियों की नहीं, बल्कि पूरे प्रेस क्लब की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचाया। वीडियो देखने वाले हर व्यक्ति के मन में प्रश्न उठा— “क्या यही पत्रकारिता की संस्कृति है?”
यह उम्मीद की गई थी कि समर खडस अपनी ग़लती के लिए माफ़ी मांगेंगे, परंतु उन्होंने किसी तरह की माफ़ी नहीं मांगी। घटना की जांच के लिए मुंबई प्रेस क्लब ने खडस समर्थकों की कमेटी बना दी और उस कमेटी ने प्रेस क्लब की गरिमा को ताक पर रखकर खडस के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें क्लीन चिट दे दी। जबकि खडस के व्यवहार का विरोध करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
मुंबई प्रेस क्लब आज जिस स्वरूप में है, उसमें पूर्व अध्यक्ष गुरबीर सिंह का अहम योगदान रहा है। इसके बावजूद मौजूदा कमिटी ने प्रेस क्लब से गुरबीर सिंह की सदस्यता इसलिए निलंबित कर दी, क्योंकि कथित तौर पर उन्होंने भीमा-कोरेगांव के आरोपियों को डिनर पर बुलाया था। यहां ध्यान देना होगा कि जो लोग प्रेस क्लब में आए थे, वे आरोपी हैं, अभी उनका नक्सलियों से संबंध अदालत में साबित नहीं हुआ है, लेकिन प्रेस क्लब की कमेटी ने उन्हें अदालत का अंतिम फैसला आने से पहले दोषी घोषित कर दिया और अपने एक सम्मानित सदस्य को क्लब से निकाल दिया।
मौजूदा कमेटी ने चुनाव लड़ रहे एक सदस्य की पत्नी को चुनाव अधिकारी नियुक्त कर दिया, जिस पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे। चुनाव अधिकारी ने बड़ी संख्या में सदस्यों के नामांकन पत्र रद्द कर दिए। अनेक सदस्यों ने इस कार्रवाई को अलोकतांत्रिक और पक्षपातपूर्ण बताया। नामांकन रद्द होने के बाद ऐसी स्थिति बन गई थी कि चुनाव अधिकारी के पति को निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अन्य उम्मीदवारों की उम्मीदवारी बहाल हुई। अदालत ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए एक ऑब्जर्वर भी नियुक्त किया। इसके बाद तो मौजूदा पैनल को नैतिक आधार पर चुनाव ही नहीं लड़ना चाहिए था, लेकिन इसके बावजूद खडस गुट ने प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक अलायंस (पीडीए) बनाया और दिल्ली में ड्यूटी करने वाले राजीव खांडेकर को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया, जबकि राजीव के नाम को लेकर उनके अपने चैनल के भीतर भी असहमति की चर्चा रही है। कई पत्रकार राजीव के लिए बैटिंग करते हुए दावा किया है कि राजीव खडस गुट के उम्मीदवार नहीं हैं, लेकिन पीडीए के लगभग सभी उम्मीदवार खडस के ही सहयोगी रहे हैं।
कहने का तात्पर्य, इस बार चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा व्यक्ति नहीं, व्यवस्था है; पद नहीं, प्रक्रिया है; सत्ता नहीं, संस्कार हैं। प्रेस क्लब में मतभेद होना स्वाभाविक है। विचारों का टकराव भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन मतभेद का उत्तर गाली नहीं हो सकता, असहमति का उत्तर धमकी नहीं हो सकता और आलोचना का उत्तर संस्थागत कार्रवाई नहीं हो सकता। यदि पत्रकारों की संस्था में ही असहमति के लिए स्थान नहीं बचेगा, तो समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा का नैतिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाएगा।
आज आवश्यकता ऐसे नेतृत्व की है जो संवाद को संघर्ष पर, संयम को आक्रोश पर और लोकतंत्र को व्यक्तिवाद पर प्राथमिकता दे। ऐसे लोगों की जो राजनीतिक दलों से संवाद रखने में सक्षम हों, लेकिन किसी राजनीतिक प्रभाव से संचालित न हों; जो पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा करें, लेकिन व्यक्तिगत प्रतिशोध की राजनीति न करें; जो संस्था को जोड़ें, बांटें नहीं। इसी संदर्भ में Save The Press Club Alliance के उम्मीदवारों समेत अनेक पत्रकारों को एक वैकल्पिक सोच के रूप में दिखाई देता है। अध्यक्ष पद के उम्मीदवार सुरेंद्र गांगण समेत इस मंच से जुड़े सभी चेहरे शांत, सौम्य, संतुलित और संवादप्रिय माने जाते हैं। उनके बारे में यह विश्वास व्यक्त किया जाता है कि वे प्रेस क्लब में फिर से लोकतांत्रिक वातावरण, पारदर्शिता, संस्थागत गरिमा और पत्रकार एकता को स्थापित करने का प्रयास करेंगे। यह समर्थन किसी व्यक्ति-विशेष के प्रति नहीं, बल्कि उन मूल्यों के प्रति है जिन पर प्रेस क्लब की स्थापना हुई थी।
यह चुनाव किसी से बदला लेने का अवसर नहीं है। यह किसी विचारधारा की लड़ाई भी नहीं है। यह उस सोच के विरुद्ध खड़े होने का अवसर है जो संस्था को व्यक्तियों से बड़ा मानने के बजाय व्यक्तियों को संस्था से बड़ा मानने लगती है। प्रेस क्लब किसी गुट, किसी विचारधारा या किसी व्यक्ति की जागीर नहीं है। यह हर पत्रकार की साझा संस्था है और इसकी सबसे बड़ी पूँजी इसकी विश्वसनीयता है। मतदान करते समय यह मत देखिए कि कौन किसके साथ खड़ा है। यह देखिए कि कौन संवाद की संस्कृति के साथ खड़ा है; कौन जवाबदेही की बात करता है; कौन पारदर्शिता को महत्व देता है; कौन असहमति का सम्मान करता है; और कौन प्रेस क्लब की गरिमा को सर्वोपरि मानता है।
इतिहास गवाह है कि संस्थाएं भवनों से नहीं, मूल्यों से महान बनती हैं। मुंबई प्रेस क्लब की प्रतिष्ठा भी उसकी इमारत से नहीं, बल्कि उसके सदस्यों के आचरण, लोकतांत्रिक परंपराओं और पत्रकारिता के आदर्शों से तय होगी। इसलिए इस बार आपका एक वोट केवल किसी उम्मीदवार की जीत या हार तय नहीं करेगा। आपका एक वोट यह तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियाँ मुंबई प्रेस क्लब को किस रूप में याद करेंगी, एक ऐसी संस्था के रूप में जहाँ संवाद, गरिमा और लोकतंत्र सर्वोपरि थे, या ऐसी संस्था के रूप में जहाँ इन मूल्यों से समझौता कर लिया गया।






