–देवेन्द्र कुमार मिश्रा–
डरते–डरते सुमन ने मां से कहा– ‘मैंने शादी कर ली है।’ दूसरी तरफ से मां के रोने की आवाज सुनाई देने लगी। अचानक पिता की आवाज सुनाई दी। शायद मां से फोन ले लिया था पिता ने।
‘तुम हमारे लिए मर चुकी हो।’
सुमन को भी रोना आ गया। उसने उदास स्वर में कहा– ‘ऐसा क्यों कह रहे हैं आप। मैंने बिना बताये शादी ही तो की है। अब बता रही हूं। पहले बताती तो आप मना कर देते। लड़का पढ़ा–लिखा है। सरकारी नौकरी में है। बस जाति भर अलग है।’
पिता का स्वर क्रोध से भरा था. ‘तुमने अपने परिवार को बताना भी जरूरी नहीं समझा। तुमने एक लड़के के प्रेम में पड़कर अपने परिवार को भुला दिया। कितने लाड़–प्यार से पाल पोसकर हमने तुम्हें बड़ा किया। क्या इसी दिन के लिए कि तुम भागकर अपनी मर्जी से शादी कर लो। हम तुम्हारे कुछ नहीं लगते। चार दिन की जान–पहचान वाला लड़का इतना महत्वपूर्ण हो गया कि घर–परिवार के लोग दुश्मन लगने लगे। वो सबकुछ हो गया और हम कुछ भी नहीं। अपनी शक्ल मत दिखाना आज के बाद।’
सुमन दुखी हो गई पिता की बात सुनकर। उसने कहा– ‘जब भैया ने अपनी मर्जी से दूसरी जाति में शादी की थी, तब तो आपने उसे कुछ नहीं कहा। बल्कि एक बड़ी पार्टी देकर उसके विवाह को स्वीकार किया था आपने। फिर मेरे साथ ये दुर्भाव क्यों? क्या इसलिए कि मैं बेटा नहीं बेटी हूं।’
‘बेटी हो इसलिए तो बड़े अरमान थे तुम्हारी शादी के। मैं तलाश तो रहा था तुम्हारे लिए अच्छा वर।’ पिता ने कहा। स्वर में कुछ नरमी थी।
‘और अच्छे के लिए आपको लाखों रुपये का इंतजाम करना था। जिसके लिए आपने घर तक बेचने की बात कही थी मां से। हरदम दहेज की रकम जुटाने के लिए आप परेशान रहते थे। रातों की नींद हराम हो चुकी थी आपकी।’ सुमन के स्वर में उदासी थी।
‘वो मेरा कर्त्तव्य था। मेरी जिम्मेदारी थी तुम। हर पिता करता है। इससे तुम्हें चिंतित होने की क्या जरूरत थी?’
‘जो आप लाखों रुपये खर्च करके करते, कर्ज लेकर करते। मकान बेचकर करते। वो मैंने बिना कुछ खर्च करके कर लिया। आपको आपकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। फिर गुस्सा किस बात का?’
‘गैरजाति में विवाह अच्छा नहीं माना जाता। फिर माता–पिता, परिवार से भागकर–छिपकर शादी करना, ऐसे संस्कार तो नहीं दिये थे हमने तुम्हें। बेटियों के साथ यही तो दिक्कत है…।’
पिता अपनी बात पूरी कर पाते, इससे पहले सुमन का वर्षों से भरा गुस्सा निकल पड़ा,’ लड़कियों के साथ दिक्कत होती है। क्या कह रहे हैं आप? लड़कियों को कितनी पीड़ा पहुंचती है सोचा है कभी आपने। जब बचपन से ही उन्हें कहा जाता है कि बेटी पराया धन होती है। जब जनक और जननी अपनी बेटी से कहें कि ये घर तुम्हारा नहीं। तुम्हारा घर तो वो होगा, जहां तुम्हारी शादी होगी। क्या बीतती होगी मुझपर? सोचा है कभी आपने। ये परिवार के दिये हुए संस्कार ही तो हैं कि माता–पिता का घर मेरा नहीं था। उनके लिए पराया धन हूं मैं। आप ही अक्सर कहा करते थे, तुम्हारे हाथ पीले कर दूं तो मुक्ति पाउं। अपनी ही बेटी से मुक्ति। मां आपसे कहती थीं कि बेटी को उसके घर भेज दूं तो चैन की नींद सो सकूंगी। मैं आप लोगों के लिए इतना बड़ा बोझ थी कि मेरे कारण मां की नींद उड़ गई थी। आप मुक्ति पाना चाहते थे अपनी बेटी से। भाई अक्सर कहता था कि तुम्हारी शादी में लाखों खर्च होंगे। समझ लेना तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल गया। अब पिता की सम्पत्ति में कोई हिस्सेदारी मत मांगना। आप लोगों के ये सब कहने से मैं खुद को पराया समझने लगी। मैं स्वयं सोचते हुए डरती थी कि जिस घर में पैदा हुई, वो घर मेरा नहीं। तो कौन–सा अंजान घर होगा, जहां मुझे जाना होगा? पता नहीं वहां के लोग कैसे होंगे? मुझे अपना पायेंगे या नहीं। मैं हमेशा डरती रही कि मेरे माता–पिता का घर मेरा नहीं और किसी नये घर ने नहीं स्वीकारा तो फिर घर कौन सा होगा? होगा भी या नहीं। या सभी जगह पराया धन ही कहलाउंगी। शादी के लिए लड़के वाले पूरे झुण्ड के साथ आते और मुझे सिर से पैर तक निहारकर देखते। जमाने भर के प्रश्नों की झड़ी लगाते। कहां तक पढ़ी हूं. क्या–क्या काम आता है? मां हर बार चाय–नाश्ता बनाती और आपकी गर्दन झुकी रहती। आप लड़के वालों को मेरे गुण गिनाते रहते और लड़के वाले आराम से चाय–नाश्ता करते हुए प्रश्न पर प्रश्न पूछते रहते। लड़की की लंबाई ज्यादा है तो लड़की रिजेक्ट। लम्बाई कम है तो भी रिजेक्ट। लड़के से ज्यादा पढ़ी–लिखी तब भी रिजेक्ट। इन सबसे बच गये तो लड़की की कुण्डली में दोष निकल आते। सारे दोषों से मुक्ति के लिए आप से दहेज की राशि बढ़वाई जाती। ये आपके साथ मेरा भी अपमान था। किंतु मुझे तो चुप रहना ही सिखाया गया था। मेरा जाना तो तय था। पराया धन जो थी में।’
सुमन कहती जा रही थी और पिता सुन रहे थे। बिना कोई बात काटते हुए. न ही डांट रहे थे, बस सुन रहे थे। ‘पापा, और जब मेरी शादी नहीं जमती। तो भी आप लोग कितने उदास रहते थे। बताइये इस सब में मैं कहां दोषी थी? मां मेरे भाग्य को कोसती। अक्सर कहती– ‘न जाने क्या लिखाकर लाई है भाग्य में। कब ये बोझ सिर से उतरेगा?’ मैं बेटी थी या बोझ। फिर ज्योतिषियों के चक्कर। शादी कब होगी? क्या उपाय करना है? और आप जमाने भर के पूजा–पाठ, व्रत, उपवास मुझसे करने के लिए कहते। इससे मेरे आत्म–सम्मान को कितनी ठेस लगती। घर आकर लोग रिजेक्ट करते पूरी अकड़ से और आप लोग अपना गुस्सा मुझ पर उतारते। मैं क्या थी आपके लिए। घर तो मेरा था ही नहीं। पराया धन थी मैं, क्योंकि बेटी थी मैं। क्या यही दोष था मेरा। मैं आपके लिए ऋण थी, भार थी। मुझे लेकर कितनी आशंकायें, कितना डर था आपके अन्दर। बेटी की शादी नहीं हुई अभी तक। क्या सोचेंगे लोग? क्या कहेगा समाज? घर के सामने से लड़के निकलते तो आपका दिल धड़कने लगता। आप मुझसे कहते। घर के अंदर रहा करो। मैं अपने ही घर में बाहर के कमरे में नहीं बैठ सकती। यही संस्कार तो मिले थे मुझे। और आज जब मैंने आपका ऋण चुकाकर आपको सारे भार से मुक्त कर दिया, तब भी आप कह रहे हैं कि मैं मर चुकी हूं आप के लिए। कहीं इस बात का बुरा तो नहीं लगा आपको कि आपके पराये धन ने मालिक से बिना पूछे अपना नया मालिक कैसे चुन लिया? पराये धन से इतना मोह क्यों? इतनी नाराजगी क्यों? क्या अंतर हुआ आप लोगों में और इतिहास के क्रूर बादशाहों में जो औरत को सम्पत्ति समझते थे। इस घर में भी लोग कहेंगे, मेरी जाति दूसरी है, मैं दूसरे खानदान की हूं लेकिन इनकी बातों का बुरा नहीं लगेगा, क्योंकि ये सच होगा। ये तो मुझे आपके परिवार, खानदान का ही मानेंगे। लेकिन दुख इस बात का है कि जिस रक्त से बनी हूं, जिस घर में पैदा होकर जीवन पाया, देखा, समझा. जो सच में मेरा घर था. उस घर में पराया धन कैसे थी?’ कहते–कहते सुमन रोने लगी। कुछ देर पिता मौन रहे। फिर पिता ने आंसू रोकते हुए कहा– ‘अच्छा ठीक है। ये बताओ दामाद को लेकर अपने घर कब आ रही हो?’ पिता के मुंह से अपना घर सुनकर सुमन की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे।
सुमन ने आंसू पोंछते हुए कहा– ‘बहुत जल्द पापा।’






