आज प्रिय कथाकार दूधनाथ सिंह की जन्मतिथि /स्मृति दिवस है
उन्हें जब भी देखा चटख रंग में ही देखा है.हँसते –खिलखिलाते ,तंज कसते हुए भी ,वे प्रिय लगते थे |उम्र उनके लिए कोई मायने नही रखती थी ,वे इस मामले में चिर युवा थे | उन पर लिखा गया संस्मरण मेरी किताब लेखक की अमरता में संकलित है | उन्हें याद करते हुए यह संस्मरण प्रस्तुत है “ लेखक की अमरता ” स्वनिल श्रीवास्तव
॥ वे चले गए हैं , जब हम थे। अब हम कहां हैं ! जीवन एक आश्चर्य की तरह बचा है , और शायद आश्चर्य की तरह ही नष्ट हो जाएगा। संतोष यही है कि हमने अपना काम ,अपने ढंग और अपनी कमजोरी के साथ बखूबी निभाया। कोई कोताही नही की ॥
यह उदाहरण उनके संस्मरणों की किताब – सबको अमर देखना चाहता हूँ , से लिया गया है। इन शब्दों को पढ़कर मैं विचलित सा हो गया। इस पुस्तक में उन्होंने उन लोगों के बारे में लिखा है – जो अनंत में चले गए हैं। संभवत: य्ह उनकी प्रकाशित आखिरी किताब है । इन शब्दों में उनकी पीड़ा का अनुमान लगाया जा सकता है। हम अपना जीवन कुछ चुने हुये सहयात्रियों के साथ बिताते है । जब वे हमको छोड़कर चले जाते हैं, तो जो जगह खाली हो जाती है , वह अंत तक नहीं भरती। यह हमारे जीवन की करूण जगह है । हम उस जगह पर कभी-कभार लौटते हैं और नए सिरे से कुछ बिताए गए लम्हे याद करते हैं। इधर बीते सालों में उनके साथ के लेखक विदा हो गए। उन्हें याद करते हुए डर भी लगता है।
साठ के बाद हिंदी कहा,नी में साढ़े चार यार की चर्चा होती रही है । इस पद का प्रयोग काशीनाथ सिंह ने किया था। साढ़े चार याद का मतलब – दूधनाथ सिंह . ज्ञानरंजन , रवींद्र कालिया, काशीनाथ सिंह और आधा विजयमोहन सिंह हैं। देखा जाए तो इस कथा में विजयमोहन सिंह आधा नहीं। उनकी व्याप्ति आधे से कही ज्यादा है । इसकी व्याख्या दूधनाथ सिंह दूसरी तरह से करते है – देखें किस्सा साढ़े चार यार में काशीनाथ सिंह ने यारों में उन्हें आधा ही कहा है , लेकिन वह अर्द्धनारीश्वर ही था जिसने बाकी चार यारों को नही , चौदह कहा.नीकारों को स्थापित कर . कहा.नी की दुनियां को पूर्णतया बदल दिया ( साठ के बाद की कहानियों की भूमिका से – जिसे दूधनाथ सिंह ने पचास साल बाद पुन: प्रकाशित किया है )
संस्मरणों की इस किताब में उन्होंने विजयमोहन सिंह पर बड़े मनोयोग से लिखा है… सबको अमर देखना चाहता हूं –यह शीर्षक उन पर लिखे गए संस्मरण से लिया गया है। इस संस्मरण से कुछ वाक्य याद आ रहे हैं।
…मैं नही जानता था कि एक दिन अचानक विजयमोहन सिंह चुपके से निकल जायेगे और मैं निह्त्था और हताश हो जाऊंगा । सबको अमर देखना चाहता हूं और इस चाहत के विपरीत चीजें मेरे सामने घटित होती रहती हैं। मैं कहां जाऊं , क्या करूं कि वे सब लौट आएँ
मैं कहां जाऊं , क्या करूं – यही वाक्य उन्होने दिल्ली के अस्पताल में कवि मित्र अनिल सिंह के सामने दोहराया था । जब किसी की मृत्यु सन्निकट होती है तो इसी तरह के भाव पैदा होते हैं। यह अजीब सी बात है कि अमरता की कामना करनेवाला लेखक अपने अंतिम क्षणों में इतना निरीह और अकेला हो जाता है । दूधनाथ सिंह ने अपनी अमरता के लिए कोई इंतजाम नहीं । उनके पास अंधभक्तों की फौज नहीं। जो ढोल बजाकर, गाकर उनके अमर होने की कामना करे। हालांकि हिंदी में यह रिवाज बन रहा है कि कुछ लोग अमर होने के लिये मरने का इंतजार नही करते । वे जीते-जी अमरता का अनुष्ठान करते रहते हैं। अपनी ग्रंथावलियां छपाते है । किराये के आलोचकों से अपनी यशोगाथा लिखवाते हैं। नगर नगर में अभिनंदन समारोह आयोजित करवाते है । ये वे लोग हैं जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा नहीं है। लेखक कभी मरता नहीं है , उसके शब्द उसे अमर बनाते हैं। दूधनाथ सिंह जैसे लेखक अमरता का ढोंग करते । जो लोग उन्हें करीब से जानते हैं, उनके लिए वे सखा थे। हालांकि उनकी बदमाशियों के कम चर्चे नहीं। उनके भीतर एक खिदड़पन था – जिसकी झाँकी उनकी रचनाओं में मिलती है। हम सब मनुष्य है देव नहीं। हम कमजोरियों के पुतले है । लेकिन सबसे ज्यादा आदर्श की मांग लेखक से ही की जाती है। जबकि लेखक देवताओं से कम पतित होता है
दूधनाथ सिंह का अंतिम अरण्य झूंसी था। जिसे आख्यानों में प्रतिष्ठापुरी के नाम से जाना जाता है । विदेशी आक्रांतओ ने इस शहर में आग लगा कर नष्ट कर दिया था । नगर झुलस गया था , इस कारण इसका नाम झूंसी पड़ गया है। इस झुलसे हुए नगर में दूधनाथ सिंह ने अपने उत्तरजीवन का बसंत मनाया था। जब कुछ करने को नही होता था वे झूंसी के छोटे से रेलवे स्टेशन पर वक्त बिताया करते थे और मुसाफिरों की आवाजाही देखते थे । झूंसी पुरूरवा और उर्बशी की लीला भूमि थी। पुरूरवा और उर्वशी की प्रेम कथा को उन्होंने नए कोण से प्रस्तुत किया है।यमगाथा का प्रकाशन वर्ष 1889 है। मैं उनसे यह पूछना भूल गया था कि उन्होंने झूंसी का चुनाव क्यों किया। क्या वे इस मिथक को वहां जीना चाहते थे या इलाहाबाद की भीड़भरी जिंदगी से ऊंब कर उस एकांत में अपना ठीहा बनाना चाहते थे ? । बहुत सारे सवाल हम अपने लोगो से पूंछने से भूल जाते है । मैं अपने पिता से बहुत सारे सवाल पूछने से रह गया था। वे सवाल और जिज्ञासाएँ हमारे लिए पहाड़ बने हुए हैं।
दूधनाथ सिंह की मृत्यु के बाद मुझे पुरूरवा और उर्वशी के मिथक की याद आई। यह संयोग है कि जब मैं इलाहाबाद आया था, तब कुछ दिन बाद झूंसी देखने गया था। मैं उस समय दिनकर की उर्वशी पढ़कर इस मिथक से आक्रांत था। सातवें दशक में झूंसी खंडहर और ढ़ूह का समुच्चय था। अब उसकी जगह एक आधुनिक शहर ने ले ली है। तो सबसे पहले उनके नाटक के कुछ स्थल याद आ रहे हैं। यमगाथा का नायक पुरूरवा पौराणिक नायक से अलग है । वह पुरानी अवधारणाओं को खंडित करता है। दूधनाथ सिंह ने इसे वर्तमान से जोड़ा। इसी तरह के प्रयोग उनके गुरू धर्मवीर भारती ने अपने काव्यनाटक- अंधायुग में किया था । इस तरह की साहसिकता एक चेतना सम्पन्न लेखक के यहां ही दिखाई देती है – जो मिथक में अपने समाज के वर्तमान की खोज करते है । पुरूरवा कहता है –जिन मंत्रो से इंद्र का राज्याभिषेक हुआ है , उससे मेरा अभिषेक नही होगा । इस तरह वह इंद्र के स्वामित्व और देवत्व को चुनौती देता है।
इस नाटक में इंद्र से अग्नि मांगने का प्रकरण है । हम जानते है कि मनुष्य के जीवन में अग्नि की क्या भूमिका है । अग्नि पंचतत्वो में सबसे ज्यादा शक्तिशाली तत्व है – इससे जीवन का कारोबार चलता है । पुरूरवा और इंद्र के बीच का सम्वाद देखे –
पुरूरवा – हमारी प्रजा अंधेरे में है देवेंद्र !
इंद्र – उन्हे आदत है सम्राट ! उन्हे अंधेरे में रहने दीजिये ।
पुरूरवा – उन्हें अग्नियां चाहिये ।
इंद्र -..जिनकी आंखे अंधेरे की अभ्यस्त है वे प्रकाश में अंधे हो जाते है राजर्षि
पुरूरवा – मै बचनबद्ध हूं देवेंद्र ।
अंततः, पुरूरवा स्वर्ग से प्रजा के लिए अग्नि चुराता है और उसे उसका दंड भी मिलता है। अग्नि का यह मिथक केवल भारतीय आख्यानों तक सीमित नहीं । हमारे आख्यानों पंच तत्वों में अग्नि प्रधान तत्व है । अग्नि हमे जलाती नही, दीप्ति करती है। वह अंधेरे के विरूद्ध जलती है । यूनानी पुरा कथा में यह भूमिका प्रोमोथियस निभाता है । वह स्वर्ग से अग्नि चुराता है और उसे इस जुर्म में एक चट्टान से बांध दिया जाता है। दूधनाथ सिंह इस मिथक को हमारी चेतना से जोड़ते है । इस नाटक में पुरूरवा एक परम्पराभंजक नायक है – जो लीक से हटकर चलना चाहता है ।प्रजा का हित उसके लिए सर्वोपरि है । वह इंद्र को असुर और ऋषियों को धूर्त , मक्कार , पापत्मा कहने का साह्स रखता है ।
दूधनाथ सिंह ने अपने लेखन में परंपरा की रूढ़ि को तोड़ा है। उनकी मूल विधा कहानी है, लेकिन उन्होंने अपने लेखन को एक विधा तक सीमित नही किया है। कहा,नी के अलावा कविता ,उपन्यास , नाटक, संस्मरण तक अपने रचनात्मकता का विस्तार किया है । वे बेचैन लेखक है । इसलिये उन्होने अपनी बेचैनी को प्रकट करने के लिये अनेक विधाओ का चुनाव करते है ।प्राय: विधाओ में आवाजाही को लोग संदेह की दृष्टि से देखते में बिफल लोग दूसरी विधा का चुनाव करते है । कतिपय असफल कवि आलोचना की दुनिया में प्रवेश करते है और लोगो की खबर लेते हैं। बाद में उनके मठ बन जाते है और वे मठाधीश बन जाते हैं। मुक्तिबोध भले ही मठ और गढ़ तोड़ने का उपदेश देते रहे । लेकिन मठ बनते ही रहे। मठाधीश का आधुनिक नामकरण माफिया है। हिंदी में इस प्राजाति का जन्म हो चुका है
दूधनाथ सिंह आलोचकों के प्रिय कभी नही रहे बल्कि वे उनके कोपभाजन बने रहे। उनके मित्र उनके प्रति रच्नात्मक रूप से सम्वेदनशील नही रहे । इसका उदाहरण निराला पर लिखी उनकी पुस्तक—निराला: आत्महंता आस्था है। इस पुस्तक में उन्होने निराला पर नये ढ़ंग से विचार किया है और वे अभियोग के शिकार हुये । अगर वे प्राध्यापीय तरीके से निराला पर विचार करते तो संकट का सामना न करना पड़ता
उनकी पहली कहानी सपाट चेहरे वाला आदमी – अजमेर की पत्रिका लहर में प्रकाशित हुई थी । इस कहानी में उन्होंने फैंटेसी का प्रयोग किया था। एक इंटरव्यू में उन्होने बताया है कि फैंटैसी उनके लिये अयथार्थ से यथार्थ तक पहुंचना है । अनरीयल से रीयल तक जाना है । फैंटसी का इस्तेमाल मुक्तिबोध के यहां खूब मिलता है। उनकी कहा,नी पक्षी और दीमक . विपात्र , सतह से उठता हुआ आदमी . क्लाड इथरली ,इसके उदाहरण हैं। मुक्तिबोध उनके पसंदीदा लेखक हैं। यह संयोग नही है । दूधनाथ सिंह ने अपनी कहा.नियों में फैंटसी और लोकमिथकों का प्रयोग किया है। मुक्तिबोध की कहानियों की चर्चा बाद में हुई । वे कवि के रूप में ज्यादा जाने गये । अगर उनकी कहा,नियों को उस दौर की कहा,नियों के साथ चर्चा की जाती तो कहा,नी का विमर्श व्यापक हो सकता था । साठ के बाद के कहा,नीकारों की कहा,नियां मोहभंग की कहा,नियां है । हमारे पारिवारिक और सान्कृतिक जीवन में आजादी के बाद जो विघटन शुरू हुआ – ये कहा,नियां उसका दस्तावेज है ।
साठ के बाद की जो पीढ़ी आयी है उसमे दूधनाथ सिंह को अलग से पहचाना जा सकता है । इसे जांचने के लिये विजयमोहन और मधुकर सिंह द्वारा सम्पादित – साठ के बाद की कहा>नियां – संग्रह देखा जा सकता है । इस संकलन में चौदह कहा,नीकारों की कहा,नियां शामिल हैं। इस संग्रह में दूधनाथ सिंह ( रक्तपात , इंतजार ) ज्ञानरंजन( फेंस के इधर उधर , पिता ) काशीनाथ सिंह ( आखिरी खत , सुख )महेंद्र भल्ला ( तीन चार दिन . एक पति के नोटस ) रवींद्र कालियां ( डरी हुई औरत, बड़े शहर का आदमी ) विजयमोहन सिंह (मुक्ति , बेसमेंट ) गुणेंद्र सिंह कम्पानी उर्फ अशोक सेक्सेरिया ( छाया , बिल्डिंगबिल्डिंग) के अलावा प्रबोध कुमार ( आखेट , अभिशप्त ) की कहा,नियां सम्मिलित है । ये वे कहानीकार थे जिनका कोई संग्रह प्रकाशित नही हुआ था । आगे चल कर ये कहानीकार हिंदी के मुख्य कहानीकार बने । नयी कहा,नी आंदोलन के बाद कहानीकारों की इस पीढ़ी ने हिंदी कहा,नी की भाषा और कथ्य को बदलने का काम किया । कहानीकारों की इस पीढ़ी की यथार्थ दृष्टि मोहन राकेश की पीढ़ी से ज्यादा तीक्ष्ण थी । यह भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि नई कहानी या साठ के बाद के साढ़े चार के कोष्टक के बाहर के कथाकारों ने कहानी के परिदृश्य को समृद्ध करने में कम योगदान नही किया है । समीकरणो के बाहर भी उल्लेखनीय घटित होता है । हमे भीष्म साहनी , अमरकांत, भैरव प्रसाद गुप्त ,शेखर जोशी . विद्यासागर नौटियाल , शलेश मटियानी को नही भूलना चाहिये ।
साठ के बाद की कहानियां संकलन की भूमिका में विजयमोहन सिंह ने साठ के बाद के कथाकरों के मूल कथा भाव को व्यक्त करते हुये लिखा है –आज की प्रत्येक कहानी सम्बंधो से शुरू होती हैऔर समाप्त होती है एक अर्थहीनता की अनुभूति पर । एक व्यापक अर्थहीनता जो किसी कुंठा या निराशा की परिणति नही—केवल एक मोहभंग की तर्कसंगत परिणति है।
इस संग्रह में दूधनाथ सिंह की कहानी रक्तपात को विजयमोहन सिंह के कथन में देखे तो यह कहा,नी भी एक तरह के मोहभंग की कथा है । यह कहानी पति-पत्नी के बीच फंसी एक मां की कहानी है। दूधनाथ सिंह की कहानियां विघटित पारिवारिक जीवन की ट्रेजिक कथायें है जिसमे भग्न दाम्पत्य है । मध्यवर्गीय जीवन का कैलेसनेस है। चाहे वह गांव का मध्यवर्ग हो या शहर में रोजी रोटी के लिये संघर्ष करता मध्यवर्ग । उन सबकी तकलीफे अलग अलग होते हुये एक सी है । रक्तपात पढ़ते हुये हमे भीष्म साहनी की कहा,नी चीफ की दावत या अमरकांत की कहा,नी दोपहर का भोजन की सहज याद आती है । कमलेश्वर की पीढ़ी में कुछ जीवन मूल्य बचे हुये थे लेकिन साठ के बाद की पीढ़ी में बचे हुये मूल्यों से मोहभंग हो चुका था । साठ के बाद का समय भारतीय राजनीति का बदलता हुआ समय था । आजादी के बाद जो सपने हमारे राजनेताओं ने दिखाये थे – उसमें टूटन शुरू हो गयी थी । मुक्तिबोध की कविताओं में इसे गहरे से व्यक्त किया गया है ।
दूधनाथ सिंह को कहानियों से विशेष चर्चा मिली। उनकी मुख्य कहानियों में निष्कासन ,धर्म्क्षेत्रे कुरूक्षेत्रे , प्रेम कथा का अंत . माई का शोकगीत और नमो अंधकराय का उल्लेख किया जाता है । नमो अंधकराय उनकी वह कहा,नी है जो अपने खिलद्दड़पन के कारण बेहद कुख्यात हुई । इस कहानी के पात्र इलाहाबाद के रंगमंच के जीते जागते पात्र थे । हिंदी कथाकारों ने इस तरह की कहा,नियां लिखने के खतरे कम नही उठाये है । इस तरह की कहानियों में पाठकों को लेखक का प्रतिशोध दिखाई देता है । हमारी पीढ़ी के लेखक उदयप्रकाश की कहा,नी – राम सजीवन की प्रेम कथा और पाल गोमरा का स्कूटर को याद किया जा सकता है । इसी प्रयोग को इस कहानी में दोहराया गया है। दुखद यह है कि इस तरह की कहानियों की संरचना . भाषा और कथ्य की जगह अन्यत्र की चर्चा शुरू हो जाती है । इस तरह एक अच्छी कहानी की मृत्यु हो जाती है । उसके अंदाज़-बयां पर पाठको का ध्यान नहीं जाता है । मैं इस विवादास्पद कहानी के कुछ अंश प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ…
….गुरू के बिना हमारा जीवन सूना है । हम बहुत तिडतिड़ाते हैं । ठिन्न ठिन्न करते हैं । अक्सर गुरु ऐसे काम कर बैठते हैं , इतना नुकसान पेल देते हैं। ऐसी अंडस में डाल देते हैं कि फटने लगती है ….गुरू का मठ सदा भरा रहता है । अक्सर कुछ न कुछ दिनों बाद मठ में ऐसा चेहरा दिखाई देता है। गुरू इस चेहरे को सूम के धन की तरह बंडी के भीतरवाली जेब में रखते है ।
दूधनाथ सिंह ने इस तरह लिखने के खूब खतरे उठायें है लेकिन इस मारक खिलद्दड़पन के शिकार कम नही हुये है । मुझे लगता है कि अपने दुश्मनों से इसी तरह के प्रहार से प्रतिशोध लेते थे। उनके जीवनकाल में उनके दुश्मन कम नहीं थे। उनकी मृत्यु के बाद उनसे बदला लेने वाले कम नहीं हैं। हिंदी साहित्य में इस तरह के आघात और प्रतिघात नये हैं। बड़े से बड़े , छोटे से छोटे लेखको में यह क्षमता मौजूद है । बस वार करने का वाजिब समय मिलना चाहिये ।
बाबरी मस्जिद विध्वंश हमारे भारतीय समाज की बड़ी दुर्घटना है । इस घटना ने न केवल राजनीतिक परिदृश्य को बदला है जिसने समाज के ताने – बाने को छिन्न – भिन्न कर दिया है । मुंबई का दंगा और गुजरात – संहार , इस घटना के प्रतिफल हैं। जनता को उन्मादित कर किस तरह उनका राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सकता है , इसका प्रयोग बी जे पी ने बखूबी किया और सत्ता भी हासिल की है । इस ध्वंश से राजनीति में जिस तरह के ध्रुवीकरण की शुरूवात हुई है , उसके नतीजे हम अब तक भुगत रहे है । इस घटना को लेकर कविताएँ और लेख बड़ी संख्या में लिखे गए हैं। कुछ कहानियां सामने आयी है । लेकिन जहां तक ज्ञात है, उपन्यास की कल्पना किसी लेखक ने नहीं की। दूधनाथ सिंह ने आखिरी कलाम जैसा उपन्यास लिख कर इस कमी को पूरा ही नही किया वरन एक विमर्श को जन्म दिया । यह सम्प्रादायिकता का नया उभार था – जो राजनीति और धर्म के मिले जुले आसव से निर्मित किया गया था । इस उपन्यास के विवरण हमें स्तब्ध करते हैं। 4 दिशम्बर 92 को दूधनाथ सिंह अयोध्या में किसी प्रकाशन संस्थान के उदघाटन के अवसर पर आये थे । वहां उन्होंने अपना वक्तव्य दिया। उपन्यास के बीज उसी दिन पड़े। यह उपन्यास 2007 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में हिंसा की बर्बर ध्वनियां और नेपथ्य में चल
रही सत्ता- राजनीति के षडयंत्रो के कई विवरण है । इस उपन्यास के प्रमुख सूत्रधार आचार्य तत्सत पांडेय और सर्वात्मन है । आचार्य जी आजादी पूर्व के नायक है । स्वतंत्रता संगाम में उनकी सक्रिय भूमिका थी ।उनका संबंध नेहरू जी और उस दौर की राजनीति से था। वे उदभट विद्वान और सोच से प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति हैं- जो कहते है कि किताबे शक पैदा करती है । आगे का वाक्य देखें –एक किताब तुम्हारे भीतर सदियों से जमी हुई काई को साफ करती है। वह तुम्हें चोट पहुंचाती है। वह तुम्हारा बध करती है । वह तुम्हारे अंदर की हिंसा को पी जाती है । एक किताब तुम्हारी सारी ताकत को निचोड़ लेती है ।
इस उपन्यास में ऐसे कई स्थल हैं जो हमें हैं। हमारी परम्परागत सोच को खारिज करते है । लेखक कई तरह की वैचारिक स्थापनायें करता है ।
अयोध्या में राम लला के मंदिर की स्थापना को लेकर जिस प्रजाति का जन्म हुआ है , उसे कारसेवक कहते हैं। यह शब्द सिख धर्म के कारसेवकों का मूल शब्द है। उनकी अयोध्या में अलग बस्ती है – कारसेवकपुरम , जिसके बारे में इस उपन्यास में कहा गया है कि अयोध्या कारसेवकों का सामूहिक शौचालय है । इसी के पास विश्व हिंदू परिषद का दफ्तर है। ये कारसेवक हिंदू धर्म के वाहक नही है- उन्मादी लोगो का एक झुंड है – जो किसी न किसी तरह सत्ता और तथाकथित धर्म को लाभ पहुंचाने का काम करता है । जैश्रीराम का नारा उनकी जीवनीशक्ति है । ये नारे अपनी किंवदंतियों के साथ बड़े होते हैं। लेखक कहता है कि किवदंतियों में एक फासिस्ट तत्व होता है , लोग जैसा चाहे वैसा गढ़ लेते है । उन्हे तर्क पर चढ़ाना बेकार है । इन्ही तत्वों में गांधी के प्रमुख भजन –रघुपति राघव राजाराम.. में ईश्वर अल्ला तेरो नाम को हटा कर –जै रघुननदन जै घनश्याम जानकी बल्लभ सीताराम – पंक्ति जोड़ी है ।
इस उपन्यास में मठो और मठाधीशो के जीवन के बारे कुछ दिलचस्प सूचनाये है । उपन्यास में अचेतानंद है – जिनके ऊपर अपने गुरू की हत्या का आरोप है जिसने उनके उनके ऊपर गुरू की हत्या का इल्जाम लगाया था – उसकी सरे- आम हत्या अचेतानद ने कर दी थी । फलस्वरूप जेल में रहे और अंत में निर्दोष छूट गए। वे खंडित लोग के साधु हैं। भरा –पुरा परिवार है । आचार्य जी से अचेतानद की बातचीत मठ- संस्कृति अयोध्या के मठो और मठाधीशो के विलासी और अभिजात जीवन का ब्लूप्रिंट प्रस्तुत करती है । इसके बरक्स अन्य समुदायों के ऐसे दृश्य हैं – जो हमें हैरान करते हैं
अयोध्या के बीच में टूटे-फूटे उजाड़ घर और भग्न कब्रगाहें मिलेंगी। जिनकी शिनाख्त मिटा दी गई है। ऐसी एक जगह आफताफ अली मी मजार थी । नेहरू जी से उनका अच्छा सम्बंध था । वे लोगो में लोकप्रिय थे । नेहरू ने वहां के कलेक्टर को हिदायत दी थी और आफताब अली के निवास से कनक भवन से लक्ष्मण घाट की सड़क बनवाई थी । उन्होंने लोगों से कहा था कि उन्हें इमली के पेड़ के चबूतरे के पास दफनाया जाए। अब वह मुबारक मज़ार वहाँ है। एक नेता ने मुस्लिम मजदूर से वह मजार खुदवा कर सरयू नदी में फेकवा दी और उस जमीन को अपनी कोठी के अहाते में शामिल कर लिया ।
यह उपन्यास एक जमील मिज़ाज के बारे में है जो जम्मू में उर्दू टीचर थे – उनकी करुण कथा है। अभी दो साल पहले जब दूधनाथ सिंह यहां की एक संस्था से सम्मान लेने आए। तो इन पक्तियों का लेखक अयोध्या की यात्रा में था । साथ में कवि मित्र अनिल सिंह थे – जिनके साथ उन्होने 4 दिसम्बर 92 में अयोध्या की यात्रा की थी । इस तारीख के 23 साल बाद वे अयोध्या में थे । हम लोगों ने उपन्यास में वर्णित जगहों को देखा। वहां जमील मिया मिले। लेकिन उनकी याददाश्त साथ नहीं दे रही थी। दूधनाथ सिंह ने उन्हे याद दिलाया और कहा कि हम लोग इलाहाबाद से आ रहे है तो उन्होने जबाब दिया कि अभी कुछ साल पहले आनंद भवन गये थे – नेहरू जी ने अपनी बेगम से कहा कि जमील मिंया आये है इन्हे कबाब पराठा खिलाओ ।
यह जमील मियां का जादुई यथार्थ था। वे अपने वर्तमान से दूर और त्रासद इलाके में छलांग लगा चुके थे। एक नगर की स्मृति को हर तरह से ध्वस्त किया जा चुका था। इसी यात्रा में एक अखबार को इंटरव्यू देते समय उन्होने यह कहा था –अयोध्या को झूठ के रूपक में बदल देने की एक से एक बढ़कर शातिर कोशिश मुझे उसको सामान्य शहर के रूप में पहचानने नही देती – तिस पर ईश्वर के बिनिमय के उपक्रम बढ़ते जा रहे हैं ।
उन्होने कई विधाओं में लिखा है लेकिन वे केवल एक पुस्तक- आखिरी कलाम – के लेखक के रूप में ज्यादा जाने जायेगे । क्योकि यह एक उपन्यास नही हमारे समय और राजनीति पर गम्भीर बहस है । इसमें एक धार्मिक नगर का बदरंग चेहरा नही उसे एक दोजख में बदलनेवाले कुछ शैतान चेहरे भी दिखाई देते है।
दूधनाथ सिंह से मेरी बहुत कम मुलाकाते है । मैंने उन्हे गोरखपुर के छात्र जीवन में तब देखा था – जब उनकी कहा<नी – सपाट चेहरेवाला आदमी और कविता संग्रह – सुरंग से गुजरते हुये – प्रकाशित हुआ था । उनसे मेरी छिट – फुट मुलाकातें याद है लेकिन फैज़ाबाद प्रवास में फोन पर लम्बी लम्बी बाते मेरी पूंजी है । वे मेरी प्रकाशित कविताओं और कहानियों पर विस्तार से बातें करते थे । उनकी बातों में पूंजी और राजनीति के कारण नष्ट होते जा रहे लोकजीवन की व्यापक चिंता थी। साहित्य की राजनीति से वे बेहद खफा होते थे । उनकी बातों में जो विट था – वह अक्सर याद आता है। मैं अपने आप को इस बात के लिए क्षमा नहीं कर पाऊंगा कि उन पर उनके जीवनकाल में कुछ नहीं लिख सका।
यह स्मृति लेख लिखते हुए मैं सोचता हूं कि लेखक के जाने के बाद उसके शब्द बचे रहते हैं। यही उसकी अमरता है।यह अमरता समय और संदर्भ के साथ बढ़ती रहती है।दूधनाथ सिंह पर लिखते हुए मुझे सहसा कबीर की याद आती है। उन्होने लिखा है- हम न मरिहो , मरिहो संसारा । आदमी भौतिक रूप से हमारे बीच चला जाता है , लेकिन उसके किये गये काम हमे उसके होने की स्मृति दिलाते रहते है । जब तक शब्द और स्मृति है , दूधनाथ सिंह हमारे बीच किसी न किसी रूप में बचे रहेंगे।
स्वप्निल श्रीवास्तव
510- अवधपुरी कालोनी – अमानीगंज
फैज़ाबाद – 224001






