अखिलेश अखिल
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की कथित हत्या के बाद भारत के कई हिस्सों — खासकर लखनऊ, श्रीनगर, हैदराबाद, दिल्ली, बिहार और झारखंड — में शिया समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए। यह विरोध केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे धार्मिक, ऐतिहासिक और भावनात्मक कारण हैं।
शिया इस्लाम में ईरान का सर्वोच्च नेता केवल राजनीतिक शासक नहीं माना जाता, बल्कि कई लोग उन्हें “मरजा-ए-तक़लीद” यानी धार्मिक मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं।
बता दें कि मरजा वह वरिष्ठ धर्मगुरु होता है, जिसकी धार्मिक व्याख्याओं और फतवों का अनुयायी अपने निजी और सामाजिक जीवन में पालन करता है। भारत के लखनऊ, श्रीनगर और हैदराबाद जैसे शहरों में बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग ईरानी धार्मिक नेतृत्व से वैचारिक रूप से जुड़े रहे हैं।इसलिए खामेनेई की मौत को सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि धार्मिक नेतृत्व पर हमला माना जा रहा है।
शिया परंपरा में “शहादत” (बलिदान) का बहुत गहरा महत्व है। करबला की घटना और इमाम हुसैन की शहादत शिया पहचान का केंद्रीय आधार है।कई प्रदर्शनकारियों ने खामेनेई की मौत को “शहादत” की तरह प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार यह अत्याचार के खिलाफ खड़े होने की कीमत है। इस धार्मिक प्रतीकवाद ने विरोध को और भावनात्मक बना दिया है — इसलिए महिलाओं और पुरुषों को रोते, तस्वीरें उठाए और नारे लगाते देखा गया है।
कश्मीर को कभी-कभी “ईरान-ए-सगीर” (छोटा ईरान) कहा जाता है। सदियों तक फारसी भाषा वहां की प्रशासनिक भाषा रही। कश्मीरी शिया समुदाय के ईरान से धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध ऐतिहासिक रहे हैं। इसी तरह लखनऊ भी भारतीय शिया संस्कृति का बड़ा केंद्र है। वहां का बड़ा इमामबाड़ा शिया धार्मिक पहचान का प्रतीक है। ऐसे में इन इलाकों में प्रतिक्रिया ज्यादा तीखी दिखी।
ईरान लंबे समय से खुद को फिलिस्तीन के समर्थन में खड़ा देश बताता रहा है और अमेरिका तथा इजराइल की नीतियों का विरोध करता रहा है। भारत में कुछ शिया संगठनों और मुस्लिम समूहों का मानना है कि यह हमला केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि “प्रतिरोध की राजनीति” पर हमला है। इसलिए विरोध प्रदर्शनों में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारे भी लगे।
आज के दौर में धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व सीमाओं में सीमित नहीं रहता। सोशल मीडिया और वैश्विक नेटवर्क के कारण अंतरराष्ट्रीय घटनाएं तुरंत स्थानीय प्रतिक्रिया पैदा करती हैं।भारत में शिया समुदाय संगठित धार्मिक ढांचे के तहत काम करता है — इमामबाड़े, मजलिसें और धार्मिक ट्रस्ट सक्रिय हैं। इसलिए सामूहिक शोक और विरोध तेजी से आयोजित हो गया।
यह ध्यान देना जरूरी है कि ये प्रदर्शन मुख्य रूप से शिया समुदाय तक सीमित हैं। भारत के सुन्नी बहुल मुस्लिम समाज में इतनी व्यापक सड़क-स्तरीय प्रतिक्रिया नहीं दिखी है।अभी तक ये प्रदर्शन अधिकतर शोक और राजनीतिक संदेश तक सीमित हैं, हिंसक स्वरूप नहीं लिया है।
भारत के ईरान, इजरायल और अमेरिका — तीनों से संबंध हैं। इसलिए सरकार आम तौर पर संतुलित बयान देती है और क्षेत्रीय शांति की अपील करती है। संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क रखा गया है ताकि स्थिति नियंत्रण में रहे।
भारत में शिया मुसलमानों का विरोध केवल विदेश नीति की प्रतिक्रिया नहीं है। यह धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक जुड़ाव, शहादत की परंपरा और पश्चिम एशिया की राजनीति के प्रति वैचारिक समर्थन का मिश्रण है।
यह घटना दिखाती है कि वैश्विक धार्मिक-राजनीतिक घटनाएं भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में गहरी भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा कर सकती हैं। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि यह विरोध केवल शोक तक सीमित रहता है या किसी बड़े राजनीतिक विमर्श में बदलता है।






