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‘जाति का विनाश’: संतराम बीए, आंबेडकर और गांधी के बीच वाद-विवाद और संवाद-संतराम बीए स्मृति दिवस ( 31 मई) सादर नमन

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चन्द्र भान पाल (बी एस एस)

संतराम बीए (14 फरवरी, 1887 – 31 मई, 1988), डॉ. आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956) और गांधी (2 अक्टूबर, 1869 – 30 जनवरी, 1948) आधुनिक भारतीय इतिहास के शीर्ष व्यक्तित्वों में हैं। भले ही संतराम बीए की चर्चा डॉ. आंबेडकर और गांधी तुलना में बहुत कम होती है, लेकिन वर्ण-जाति व्यवस्था के खिलाफ जिन व्यक्तित्वों ने अनथक प्रयास किया है और अपना पूरा जीवन, लेखन और क्रिया-कलाप उसके लिए समर्पित किया कर दिया, उसमें संतराम बीए भी शामिल हैं। अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके पहले भी वर्ण-जाति व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ा समर तत्कालीन भारत के अलग-अलग कोनों में चल रहा था। अलग-अलग व्यक्तित्व इसकी अगुवाई कर रहे थे। संयुक्त पंजाब (भारत और पाकिस्तान में स्थित आज के पंजाब प्रांत) में वर्ण-जाति के खिलाफ जो सबसे व्यापक और प्रभावी समर चल रहा था, वह जात-पात तोड़क मंडल चला रहा था, जिसके शीर्ष व्यक्तित्वों में संतराम बीए भी थे।

संतराम बीए ने डॉ. आंबेडकर और गांधी की तरह न सिर्फ संघर्ष किया, बल्कि विपुल लेखन भी किया है। उन्होंने करीब सौ किताबें लिखी हैं। तीनों अपने पत्र-पत्रिका निकालते थे। संतराम बीए ने 1929 से 1947 तक करीब 18 वर्षों तक उर्दू में अपनी नियमित मासिक पत्रिका ‘क्रांति’ निकाली। क्रांति उन पत्रिकाओं में शामिल है, जिसमें डॉ. आंबेडकर के लेख और उनके विचार प्रकाशित होते थे। ऐसा करने वाली उर्दू की यह पहली पत्रिका थी। तीनों अलग-अलग संगठनों के संचालक और नेतृत्वकर्ता थे। संतराम बीए का मुख्य संगठन जात-पात तोड़क मंडल था, जो आर्यसमाज का एक धड़ा था।

गांधी का जन्म वैश्य (द्विज) जाति में हुआ था। उनका जन्मस्थान गुजरात है। संतराम बीए का जन्म शूद्र कहे जाने वाले वर्ण के कुम्हार जाति में हुआ था। उनकी जन्मभूमि-कर्मभूमि पंजाब रही। वहीं डॉ. आंबेडकर का जन्म दलित जाति में हुआ था। वे मूलत: आज के महाराष्ट्र से थे, हालांकि वे मध्य प्रदेश के महू में पैदा हुए। गांधी को अपने परिवार और समाज में वर्ण-जाति की श्रेष्ठता और महानता का संस्कार-विचार मिला था। वे शुरू में न केवल वर्ण-जाति के समर्थक थे, बल्कि आर्य नस्ल में पैदा होने और उसकी श्रेष्ठता का भी दावा करते थे। गैर-आर्यों को दोयम दर्जे का काफिर मानते थे।[1] हालांकि उन्होंने बाद में धीरे-धीरे नस्ल श्रेष्ठता के विचार को छोड़ दिया। नस्लीय श्रेष्ठता के विचार से मुक्त होने के बाद भी वे लंबे समय तक जोर-शोर से जाति-व्यवस्था की महानता का गुणगान करते रहे। उन्होंने 1921 में लिखा, “मेरा विश्वास है कि यदि हिंदू समाज अपने पैरों पर खड़ा हो पाया है तो वजह यह है कि इसकी बुनियाद जाति-व्यवस्था के ऊपर डाली गई है। जाति का विनाश करने और पश्चिमी यूरोपीय सामाजिक व्यवस्था को अपनाने का अर्थ होगा कि हिंदू आनुवंशिक-पैतृक व्यवसाय के सिद्धांत को त्याग दें, जो जाति-व्यवस्था की आत्मा है। आनुवंशिक सिद्धांत एक शाश्वत सिद्धांत है। इसको बदलने से अव्यवस्था पैदा होगी।”[2] हालांकि उन्होंने 1930 के बाद जाति-व्यवस्था की वकालत करना बंद कर दिया। डॉ. आंबेडकर ने उनके भीतर के इस परिवर्तन को अपनी ‘जाति का विनाश’ किताब में रेखांकित किया है।[3] हालांकि गांधी अंत समय तक वर्ण-व्यवस्था की अच्छाई और महानता का गुणगान करते रहे और हिंदू धर्म की महान उपलब्धि के रूप में इसकी चर्चा करते रहे। वर्ण-व्यवस्था के इनके समर्थन के रूख का संतराम बीए और डॉ. आंबेडकर दोनों ने तीखी आलोचना की है।

संतराम बीए और डॉ. आंबेडकर को उनके परिवार और समाज से किसी तरह की नस्लीय और वर्ण-जाति श्रेष्ठता का कोई संस्कार-विचार नहीं मिला था। दोनों ने बचपन से जाति आधारित अपमान का सामना किया। ऐसे किसी अपमान का सामना करने का सवाल गांधी के संदर्भ में उठता ही नहीं। तीनों की आत्मकथाएं इसका साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। जैसे कि गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में वर्ण-जाति का संदर्भ नहीं के बराबर है। अप्रत्यक्ष तौर पर यदि है भी तो महानता और श्रेष्ठता के संदर्भ में। डॉ. आंबेडकर ने कोई आत्मकथा व्यवस्थित रूप में नहीं लिखी, लेकिन अपनी आत्मकथात्मक कृति ‘वेटिंग फॉर अ वीजा’ में दलित (अछूत) होने के चलते उन्हें कितने भयानक अपमानों और यातनाओं का सामना करना पड़ा, इसकी दर्दनाक चर्चा है। संतराम बीए ने व्यवस्थित रूप में अपनी आत्मकथा ‘जीवन के मेरे अनुभव’ शीर्षक से लिखी है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि उन्हें जातिगत अपमान का कई बार सामना करना पड़ा। इसके शुरुआती अध्यायों में ही उन्होंने इसकी चर्चा की है। वे लिखते हैं कि “विद्यार्थी जीवन में मुझे जात-पात के कटु अनुभव हुए। जब चौथी कक्षा में अंबाला स्कूल में भरती हुआ, तो रजिस्टर में मेरी जाति भी लिखी गई। अपने गांव में तो हमारी पर्याप्त प्रतिष्ठा और प्रभाव था। वहां मैंने अनुभव नहीं किया था कि कुम्हार भी कोई नीच जाति है। परंतु अंबाला उन दिनों होशियारपुर के जीर्णामताभिमानी लोगों का बड़ा गढ़ था। मेरे सहपाठी मुझे ‘कुम्हार’ कहकर छेड़ने लगे। छेड़ते भी क्यों नहीं, जब तुलसीदास जैसे महात्मा और महाकवि कह गए हैं–

जे वर्णाश्रम तेली कुम्हारा स्वपच किरात कोल कलवारा”[4]

इस तरह के कई जातिगत अपमानों की चर्चा संतराम बीए ने की है। स्पष्ट है कि जातिगत अपमान का दंश गांधी के विपरीत संतराम बीए और आंबेडकर के लिए भोगा यथार्थ था, गांधी की तरह सहानुभूति का मामला नहीं। इससे वर्ण-जाति आधारित व्यवस्था और इससे जुड़ी यातना के संदर्भ में अलग-अलग दृष्टिकोण तीनों के ‘जाति का विनाश’ को लेकर हुए वाद-विवाद और संवाद में दिखाई देता है।

संतराम बीए, डॉ. आंबेडकर की ‘जाति का विनाश’ किताब व गांधी यहां एक तथ्य और रेखांकित कर लेना जरूरी है। तीनों में कोई भी वर्ण-जाति आधारित अपना पेशा नहीं कर रहा था, यहां तक उनके पिता भी नहीं। संतराम बीए और डॉ. आंबेडकर ने भले ही क्रमश: कुम्हार और दलित का पारंपरिक पेशा नहीं अपनाया, लेकिन उन्हें खास वर्ण-जाति में जन्म लेने के चलते जिंदगी भर अपमान का सामना करना पड़ा।

गौरतलब है कि जात-पात तोड़क मंडल ने 1936 में लाहौर अधिवेशन के लिए डॉ. आंबेडकर को अध्यक्षीय संबोधन हेतु आमंत्रित किया था। लेकिन उनके संबोधन से जात-पात तोड़क मंडल श्रद्धा का अर्थ है किसी ने आम के पेड़ को जामुन कहा तो चुपचाप मान लेना।

या खाली मैदान में कह दिया वह देखो पीपल का पेड़ है उसे चुपचाप मान लेना, बिना दिमाग पर जोर लगाए , बिना जाने,बिना तर्क किए चुपचाप मान लेना ही श्रद्धा है इसमें दिमाग को कोई कसरत नहीं करनी पड़ती जैसे व्यायाम करने से शरीर बलिष्ठ होता है वैसे ही तर्क वितर्क करना अध्ययन करना किसी भी विषय के तह तक जाना दिमाग का व्यायाम है कसरत है जिससे दिमाग की क्षमता में वृद्धि होती है वह और तेज होता है ,श्रद्धा जो बिना जाने चुपचाप मान लेने को विवश करती है तर्क द्वारा दिमाग के कसरत करने की प्रक्रिया को अवरूद्ध करती है फिर दिमाग मजबूत कैसे होगा इस तरह हम देखते हैं कि श्रद्धा बुद्धि को तीक्ष्ण करने के बजाय और मंद करके इंसान को भक्त बना डालती है जिसका कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा आसानी से शोषण कर सकता है।

श्रद्धा ज्ञान देती है ,यह झूठ है धोखा है छलावा है धर्म के धंधेबाजों का षड्यंत्र है इस झूठे प्रचार से सावधान रहें! तर्कवादी बनें !

चन्द्र भान पाल (बी एस एस)

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