कुमार अखिल
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओमप्रकाश राजभर के ताजा बयान ने एक बार फिर उस बहस को तेज कर दिया है कि क्या भारतीय जनता पार्टी अब समाजवादी पार्टी के भीतर सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस तथा दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं और सांसदों के सत्तापक्ष के करीब आने की चर्चाओं के बीच राजभर का यह दावा कि “सपा में टूट तय है”, केवल एक राजनीतिक बयान नहीं माना जा रहा। इसे भाजपा की व्यापक राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
हालांकि अभी तक समाजवादी पार्टी में किसी बड़े नेता या सांसद द्वारा खुलकर बगावत का संकेत नहीं मिला है, लेकिन भाजपा और उसके सहयोगी दलों के नेताओं द्वारा लगातार यह दावा किया जाना कि सपा के कई सांसद असंतुष्ट हैं, राजनीतिक संकेत अवश्य देता है। खासकर तब, जब 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को कड़ी चुनौती दी थी और विपक्षी राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरी थी। सूबे का अगला चुनाव भी बीजेपी और सपा के बीच ही होना तय माना जा रहा है। ऐसे में बेचैनी तो बीजेपी में भी है। लेकिन राजनीति के बारे में कोई पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सकते।
2024 के चुनाव के बाद राष्ट्रीय स्तर पर यदि किसी क्षेत्रीय दल का राजनीतिक कद सबसे तेजी से बढ़ा है तो वह समाजवादी पार्टी है। अखिलेश यादव केवल उत्तर प्रदेश के नेता नहीं रह गए हैं, बल्कि विपक्षी खेमे में राहुल गांधी के बाद सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे हैं।लोकसभा में सपा के सांसदों की संख्या भाजपा की रणनीतिक चिंताओं का कारण हो सकती है। यदि भाजपा संसद में अपनी ताकत बढ़ाने और भविष्य में बड़े संवैधानिक या राजनीतिक फैसलों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है, तो स्वाभाविक रूप से उसकी नजर उन दलों पर होगी जिनके पास पर्याप्त सांसद हैं और जहां आंतरिक असंतोष की संभावना पैदा की जा सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र और बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मैदान है। 2027 का विधानसभा चुनाव केवल राज्य सत्ता का चुनाव नहीं होगा, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की दिशा भी तय करेगा। ऐसे में यदि सपा कमजोर होती है तो उसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है।
क्या वास्तव में सपा में असंतोष है?
हर बड़े दल में असंतोष मौजूद रहता है। टिकट वितरण, संगठनात्मक नियुक्तियां, जातीय प्रतिनिधित्व और नेतृत्व शैली को लेकर मतभेद स्वाभाविक हैं। राजभर ने ब्राह्मण सम्मेलन और कुछ सांसदों की नाराजगी का मुद्दा उठाया है, लेकिन अभी तक ऐसे ठोस सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आए हैं जो किसी बड़े विभाजन की पुष्टि करें।फिर भी राजनीति में केवल वास्तविक असंतोष ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि असंतोष की धारणा भी उतनी ही प्रभावशाली होती है। लगातार यह संदेश देना कि पार्टी में टूट होने वाली है, कई बार मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करता है और संगठनात्मक एकता को प्रभावित कर सकता है।यही कारण है कि राजभर के बयान को केवल भविष्यवाणी नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
आखिर संसद सत्र से पहले भाजपा को क्या लाभ चाहिए? यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।पिछले दो वर्षों में भाजपा की राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं दिखाई देती। पार्टी संसद के दोनों सदनों में अपनी संख्या बढ़ाने की कोशिश करती दिख रही है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।पहला, लोकसभा में भाजपा अपने दम पर बहुमत से दूर है और सहयोगियों पर निर्भर है।
दूसरा, “वन नेशन वन इलेक्शन”, परिसीमन, चुनावी ढांचे में बदलाव और अन्य बड़े विधायी प्रस्तावों के लिए व्यापक समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।तीसरा, विपक्ष जितना बिखरा रहेगा, संसद में सरकार के खिलाफ संयुक्त रणनीति बनाना उतना ही कठिन होगा। यदि किसी बड़े विपक्षी दल के सांसदों में विभाजन होता है या उनका एक हिस्सा सरकार के प्रति नरम रुख अपनाता है, तो संसद में सरकार की स्थिति स्वतः मजबूत हो जाती है।
इसलिए राजनीतिक पर्यवेक्षकों का एक वर्ग मानता है कि विपक्षी दलों में टूट केवल राज्यों की राजनीति का सवाल नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध संसद के शक्ति-संतुलन से भी है।
2027 के चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?
यदि समाजवादी पार्टी में वास्तव में बड़ी टूट होती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ भाजपा को मिल सकता है।उत्तर प्रदेश की राजनीति में विपक्षी वोटों का बिखराव हमेशा भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हुआ है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव इसके उदाहरण हैं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है।महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी की टूट के बाद मतदाताओं के एक वर्ग में सहानुभूति की राजनीति भी देखने को मिली। यदि जनता को यह महसूस होता है कि किसी पार्टी को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया जा रहा है, तो प्रतिक्रिया उलटी भी पड़ सकती है।अखिलेश यादव पिछले कुछ वर्षों में खुद को भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करने में सफल रहे हैं। ऐसे में यदि उन पर राजनीतिक हमला तेज होता है, तो इससे उनके समर्थकों का ध्रुवीकरण भी हो सकता है।
भाजपा की बड़ी रणनीति क्या है?
भाजपा की राजनीति को केवल तात्कालिक चुनावी लाभ के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। पार्टी पिछले एक दशक से राष्ट्रीय राजनीति में दीर्घकालिक वर्चस्व स्थापित करने की रणनीति पर काम करती दिखाई देती है।इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विपक्ष को चुनावी रूप से हराना है, लेकिन दूसरा हिस्सा विपक्ष की संगठनात्मक शक्ति को कमजोर करना भी माना जाता है।यदि क्षेत्रीय दल कमजोर होते हैं, उनके सांसद और विधायक बिखरते हैं तथा विपक्षी गठबंधन स्थिर नहीं रह पाता, तो भाजपा के सामने राष्ट्रीय स्तर पर कोई मजबूत वैकल्पिक धुरी नहीं बन पाती।यही वजह है कि महाराष्ट्र, बंगाल, दिल्ली और अब उत्तर प्रदेश को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं को एक बड़े राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।
फिलहाल सपा में टूट की बात दावों और अटकलों के स्तर पर है। लेकिन इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अब केवल लखनऊ तक सीमित नहीं रही। सपा की मजबूती या कमजोरी का असर सीधे राष्ट्रीय राष्ट्रीय राजनीति, संसद के समीकरणों और 2029 के सत्ता संघर्ष पर पड़ने वाला है। इसलिए आने वाले महीनों में अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से लड़ने के साथ–साथ अपने संगठन को एकजुट बनाए रखने की भी होगी।






