हिंदी सिनेमा में किसी भी फिल्म की सफलता केवल उसके हीरो पर निर्भर नहीं करती। कई बार दमदार खलनायक पूरी कहानी की जान बन जाता है। जब विलेन का किरदार प्रभावशाली हो, उसका अंदाज, संवाद और व्यक्तित्व दर्शकों के दिलों में उतर जाए, तब फिल्म लंबे समय तक याद रखी जाती है। भारतीय सिनेमा में गब्बर सिंह, मोगैंबो और शाकाल जैसे कई खलनायक आज भी मिसाल माने जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि अलग-अलग दौर में रिलीज हुई तीन फिल्मों में विलेन का नाम लगभग एक जैसा था, लेकिन तीनों फिल्मों का सफर बिल्कुल अलग रहा।
इन फिल्मों में सबसे पहले आती है ‘मुकद्दर का सिकंदर’ (1978)। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिका में थे, जबकि विनोद खन्ना ने एक अहम किरदार निभाया था। फिल्म में खलनायक का नाम ‘जग्गा’ था। यह फिल्म उस दौर की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल हुई और बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई करने के साथ आज भी क्लासिक फिल्मों की सूची में गिनी जाती है। इसकी कहानी, संगीत और अभिनय ने इसे दर्शकों के बीच अमर बना दिया।
एक नाम, लेकिन तीन फिल्मों की किस्मत अलग !
इसके बाद वर्ष 1988 में रिलीज हुई ‘दयावान’ में भी दर्शकों को लगभग इसी नाम वाला खलनायक देखने को मिला। फिल्म में विनोद खन्ना मुख्य भूमिका में थे और कहानी एक गैंगस्टर की जिंदगी पर आधारित थी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया और इसे सुपरहिट फिल्मों में गिना गया। विनोद खन्ना के दमदार अभिनय और भावनात्मक कहानी ने दर्शकों को काफी प्रभावित किया। हालांकि यह फिल्म अपने विवादित दृश्यों और अलग विषय के कारण भी लंबे समय तक चर्चा में रही।
तीसरी फिल्म थी ‘मरते दम तक’ (1987), जिसमें दिग्गज अभिनेता राज कुमार मुख्य भूमिका में नजर आए। इस फिल्म में भी खलनायक का नाम लगभग उसी तर्ज पर रखा गया था। हालांकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक सफलता हासिल नहीं कर सकी और फ्लॉप साबित हुई। इसके बावजूद राज कुमार की दमदार संवाद अदायगी, अभिनय और फिल्म की कहानी को बाद में दर्शकों ने काफी सराहा। समय के साथ इस फिल्म ने एक अलग पहचान बना ली और आज भी इसे पसंद करने वाले दर्शकों की कमी नहीं है।
इन तीनों फिल्मों की सबसे खास बात यह रही कि खलनायक का नाम लगभग समान होने के बावजूद उनकी कहानियां, किरदारों की प्रस्तुति और फिल्मों का परिणाम पूरी तरह अलग रहा। एक फिल्म इतिहास की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बनी, दूसरी ने सुपरहिट का दर्जा हासिल किया, जबकि तीसरी बॉक्स ऑफिस पर असफल रही लेकिन अपने कलाकारों के शानदार अभिनय के कारण आज भी याद की जाती है। यह उदाहरण बताता है कि किसी फिल्म की सफलता केवल किरदारों के नाम पर नहीं, बल्कि मजबूत कहानी, निर्देशन, अभिनय और दर्शकों से जुड़ाव पर निर्भर करती है। यही वजह है कि समान नाम वाले खलनायक होने के बावजूद तीनों फिल्मों ने हिंदी सिनेमा में अपनी-अपनी अलग पहचान बनाई और आज भी फिल्म प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं।






