चौथा अक्षर संवाददाता/ नई दिल्ली
एक कहावत है जब सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का, अब जिसका भाई कपिल मिश्रा, चिराग पासवान और मोदी जी हों वो इतना तो कर ही सकता है , है की नहीं? कितना शर्मनाक है कि एक शख्स खुलेआम पॉडकास्ट में दावा करता है कि उसने जंतर मंतर पर छात्रों के आंदोलन के समय एक लड़की के पिता का सिर फोड़ा, वह मरने की हालत में था सिर पर 7 टाँके लगे थे, लड़की के साथ बदतमीज़ी की और फिर भी उसके मुताबिक उसे जेल नहीं हुई। वह आगे दावा करता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कपिल मिश्रा और चिराग पासवान उसके “बड़े भाई जैसे” हैं, इसलिए उसे कुछ नहीं होगा। इतना ही नहीं, वह कहता है कि जेल जाने के बजाय वह बाहर घूम रहा था। अगर ये दावे सच हैं, तो सवाल बेहद गंभीर है दिल्ली पुलिस की कार्रवाई कहाँ है? कानून सबके लिए बराबर है या नहीं? इसका नाम स्वतंत्र भारद्वाज है इसका काम-मुस्लिम और बहुजन को मारना है, इसके दोस्त – पीएम नरेंद्र मोदी,कपिल मिश्रा और चिराग पासवान जैसे मंत्रीगण हैं ।
किसी भी सरकार के लॉ एंड ऑर्डर की असली परीक्षा यही है कि ताकतवर लोगों के खिलाफ भी कानून उतनी ही मजबूती से लागू हो। आज निशु है, कल कोई और हो सकता है। इसलिए इस मामले में निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग उठाइए। आवाज़ उठाइए। क्योंकि चुप्पी किसी भी व्यवस्था को जवाबदेह नहीं बनाती। स्वतंत्र भारद्वाज मुस्लिम लड़कियों को मुल्लानी बताते हुए अपनी दीवानी बताता है। दलित का सिर फाड़ देता है, अखिलेश यादव की मां दादी को गाली देता है।
23 जून को जंतर-मंतर की घटना पर पुलिस कहती है कि संजय कुमार की चोटें सामान्य थीं और खोपड़ी में दरार की बात निराधार है। लेकिन आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज के बयान में वह खुद “7 टांके”, “मरने की स्थिति” और “307 बनता था” जैसी बातें कह रहा हैं। वह यह भी दावा कर रहा हैं कि संजय कुमार की बेटी निशु, थाने के बाहर खड़े होकर कह रही थी कि “अगर मेरे बाप को इंसाफ नहीं मिला तो हम जहर खाकर मर जाएंगे।” साथ ही उनका दावा है कि वे जेल तक नहीं गए और “कपिल मिश्रा अपने बड़े भाई हैं”, “चिराग पासवान अपने बड़े भाई हैं” तथा “सबका सपोर्ट है।” तो सवाल है कि अगर घायल की हालत इतनी गंभीर थी और 7 टांके लगे थे, तो पुलिस की MLC में चोटें सामान्य कैसे बताई गईं? अगर धारा 307 का मामला बनता था, तो आरोपी जेल क्यों नहीं गया? “कपिल मिश्रा के फोन के बाद छोड़ने का दावा सच है या झूठ? क्या पुलिस इसकी निष्पक्ष जांच करेगी? जब राजनीतिक संरक्षण का इतना स्पष्ट दावा सामने आ रहा है, तो पुलिस यह क्यों नहीं स्पष्ट कर रही कि इस मामले में किसी अनुचित प्रभाव या हस्तक्षेप की कोई भूमिका थी या नहीं?” ये सिर्फ़ एक व्यक्ति की दबंगई नहीं, सत्ता-संरक्षण से पैदा हुई बेख़ौफ़ मानसिकता है। वह दलित लड़कियों को बांधकर जबरदस्ती,रेप करना चाहता है। दिल्ली पुलिस बताए – क्या स्वतंत्र भारद्वाज के इन दावों की जाँच होगी? क्या कोई कार्रवाई होगी? या राजनीतिक पहुँच कानून से ऊपर होने का लाइसेंस बन चुकी है?आखिर पुलिस के रिकॉर्ड और आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज के बयान में इतना बड़ा अंतर क्यों है?






