चौथा अक्षर संवाददाता / लखनऊ
आज लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसने एक बार फिर लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी और सत्ता की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। योगी आदित्यनाथ की प्रेस कांफ्रेंस में ‘लोकतांत्रिक’ बवाल हो गया।एक महिला पत्रकार ने योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछ लिया। योगी आदित्यनाथ अवाक रह गए।अगले प्रधानमंत्री बनने की धुन में उनकी बिना कोई सवाल लिए प्रेस कॉंफ्रेंस करने की आदत हो गई थी।दरअसल, मुख्यमंत्री जी अपनी बात पूरी कर बिना किसी पत्रकार के सवाल का जवाब दिए जब मंच से उठकर जाने लगे, तभी पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव ने पूरे साहस के साथ उन्हें रोकते हुए तीखा सवाल दाग दिया कि “जब सवाल का जवाब नहीं देना होता है तो प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों करते हो?”। इस बीच महिला पत्रकार चीखती रही, “मुख्यमंत्री जी, प्रेस वार्ता के लिए बुलाया है तो सवाल तो लेते जाइए। ये प्रेस वार्ता है। मुख्यमंत्री जी! प्रेस का जवाब नहीं दे पा रहे हैं आप। फिर बुलाया किसलिए था?” महिला पत्रकार के सवाल से हतप्रभ हो गए उनको ऐसी उम्मीद नहीं थी।
यह सुनते ही सूचना के ‘विशाल’ तंत्र के होश फाख्ता हो गए। सच कहा जय तो अरसे बाद लखनऊ ने एक नई सुबह देखी थी,बिना कोई सवाल लिए, बिना किसी जवाबदेही के, सिर्फ पुलिस की लाठी के दम पर राज करने वाले तंत्र का ऐतिहासिक पर्दाफाश हो गया।
एक महिला पत्रकार द्वारा सत्ता के सबसे शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के सामने जनता के हक के लिए इस तरह निडर होकर आवाज़ उठाना वाकई काबिले-तारीफ है, क्योंकि आज के दौर में जब कई पत्रकार सवाल पूछने से कतराते हैं, वहाँ दिव्या ने बिना किसी डर के पत्रकारिता के असली धर्म को निभाया है।
हालांकि, इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस द्वारा उन्हें रोककर पूछताछ करने को लेकर विपक्ष ने इसे पत्रकार का उत्पीड़न और डराने का प्रयास बताया है, जबकि दूसरी तरफ प्रशासनिक सूत्रों ने इस पर सफाई देते हुए इसे केवल वीआईपी सुरक्षा प्रोटोकॉल और सामान्य नियमों के तहत की गई रूटीन बातचीत करार दिया है। बताया जाता है दिव्या श्रीवास्तव ने 2 दिन पहले न्यूज चैनल ज्वाइन किया था, जहाँ से उन्हें निकाल दिया है उसने कहा कि “मैने योगी आदित्यनाथ से एक सवाल पूछा था, मुझे बीजेपी दफ्तर में घेर लिया, बहुत धमकाया गया कहा- तुम्हारे घर पर बुलडोजर चलेगा एल.आई.यू. पीछे पड़ी है।मुझे चैनल से भी निकाल दिया गया।मैं अब कहीं नहीं हूं।मैं बहुत डरी हुई हूं।”
दावों और प्रशासनिक दलीलों के इस विरोधाभास के बीच, दिव्या श्रीवास्तव का यह साहसिक कदम उन सभी के लिए एक बड़ी मिसाल है जो यह मानते हैं कि पत्रकारिता का असली काम सत्ता की जय-जयकार करना नहीं, बल्कि जनता की तरफ से कड़े और जरूरी सवाल पूछना है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा नाम बदलनेवाले अब ‘प्रेस वार्ता’ का नाम बदलकर ‘प्रेस एकालाप’ कर दें क्योंकि जब सिर्फ़ बयान दिया जाना है और प्रेस को सवाल पूछने का अधिकार ही नहीं है तो बिना वार्तालाप ‘वार्ता’ शब्द का क्या अर्थ रह जाता है? माननीय सबका समय क्यों ख़राब कर रहे हैं, प्रेस रिलीज़ भेजकर ही काम चलाएं और दोनों का समय बचाएं।सत्य ये है कि उप्र में सवालों की भरमार है लेकिन इनके पास जवाब ही नहीं हैं। मुँह मोड़ कर जाना, मैदान छोड़कर भागना भी कहलाता है।ये शासन में पक्षपात करते हैं और प्रेस वार्ता में एकतरफ़ा बयानबाज़ी। अब क्या ये भी कहेंगे कि ‘प्रश्न सुनने के मूड में नहीं है।’उन्होंने कहा याद रखिए, आप प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर मीडिया के कैमरों से तो बचकर भाग सकते हैं, लेकिन जवाबदेही तय करने बैठी प्रदेश की जनता की अदालत से भागना नामुमकिन है। भेदभाव और खोखले दावों का यह तिलस्म अब टूट चुका है!
वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को दिए इंटरव्यू में महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव का रो–रोकर अपना दर्द बयां करना बेहद विचलित करने वाला है। मुख्यमंत्री से सिर्फ एक सवाल पूछने के बदले में उन्हें जिस तरह बीजेपी दफ्तर में घेरकर धमकाया गया, उनके घर पर बुलडोजर चलवाने का डर दिखाया गया और उन्हें उनकी नौकरी से निकाल दिया गया, वह बेहद निंदनीय है एक लोकतंत्र में सवाल पूछना कोई गुनाह नहीं है आज देश में महिला सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी की बड़ी–बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन एक महिला पत्रकार जब अपने कर्तव्य का पालन करती है, तो उसे इस तरह मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। इस संकट की घड़ी में हम सभी को आगे आकर इस बहन का साथ देना चाहिए दिव्या श्रीवास्तव ने कोई अपराध नहीं किया है, उन्होंने सिर्फ अपना काम किया है उनके साथ हर हाल में इंसाफ होना चाहिए। प्रशासन और सरकार से हमारी पुरज़ोर मांग है कि जिन लोगों ने उन्हें डराया–धमकाया है और जिस न्यूज़ चैनल ने दबाव में आकर उन्हें नौकरी से निकाला है, उन सभी दोषियों पर कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।






