श्याम लाल शर्मा / नई दिल्ली
राजधानी दिल्ली में दो दिन का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन चल रहा है।सड़कें एकदम खाली हैं ! लुटियंस जोन दिल्ली में ऐसा लग रहा है जैसे कर्फ्यू लगा हो, कोई वाहन नहीं, पैदल को भी जगह-जगह रोक रहे हैं। दिल्ली की झुग्गियों पर पर्दे लगा दिए गए हैं ताकि ब्रिक्स के मेहमान देश की गरीबी न देख लें।ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने जो राष्ट्राध्यक्ष आ रहे हैं खाली सड़कें देखकर क्या सोच रहे होंगे? मैं मानता हूँ कि सुरक्षा बहुत जरूरी है लेकिन सड़कों को पूरी तरह खाली कर देना क्या कोई अच्छा असर डालता है?

‘चमचमाती दिल्ली’ का एक सच ये भी है। ब्रिक्स सम्मेलन के मद्देनजर लुटियंस जोन के आसपास की सड़कों पर कर्फ्यू जैसा दृश्य है और सड़क किनारे ठेला/ खोमचा लगाने वालों को पर्दा लगा कर ढंक( कैद कर) दिया गया है ताकि विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को दिल्ली की ग़रीब नहीं दिखे. भारत की बदहाल स्थिति को इस प्रकार ढक करके छिपाया जा रहा है, ताकि किसी ब्रिक्स मेहमान की नजर उस झुग्गी झोपड़ी पर ना पड़े जिससे लगे कि भारत के लोगों की हालत बाद से बदतर है जहाँ पर लोग 5 किलो अनाज पर जीवित रहते हैं लेकिन आज के दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नायाब जोड़ी को शायद यह पता नहीं है कि गरीबी ढ़कने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि आज सेटेलाइट पिक्चर के माध्यम से हर देश एक दूसरे की असलियत से रुबरु है.प्रधानमंत्री जी गरीबी पैबंद लगाने से नहीं खत्म होगी.

राजधानी दिल्ली में गरीबी और भुखमरी को पर्दे से ढकती मोदी सरकार जिससे किसी राष्ट्राध्यक्ष की नजर न उस तरफ पड़ जाय, यह परंपरा या कहें प्रयोग प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में शुरू किया था अब गरीबों को देशभर में पर्दे से ढक दिया जाता है। 2014 भाजपा सरकार ने यही नीति अपनाई है, गरीबी खत्म नहीं करनी, बल्कि गरीबों को ढककर दुनिया की नज़रों में खुद को अमीर और विकसित दिखाना है।जो बना नहीं सकते, उसे ढक तो सकते हैं। दिल्ली एक बार फिर ढक दी गई है। यहाँ के लोग, झुग्गी झोपड़ी वाले, सब्जी बेचने वाले, खोमचा लगाने वाले तीन दिनों तक कहीं आने जाने के लिए प्रतिबंधित रहेंगे।अगली बार फिर कोई इवेंट होगा तो ढकने के लिए फिर नया कपड़ा लाया जाएगा।








