श्याम लाल शर्मा
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में राष्ट्रीय राजमार्ग 12 पर स्थित , प्रतिष्ठित बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय जो भोपाल से होकर गुजरता है और 360 एकड़ में फैला है एक बार फिर इसका नाम बदल दिया गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्य परिषद की बैठक में इस ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान का नाम बदलकर अब आधिकारिक तौर पर ‘वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय’ करने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी गई है। इसके बाद प्रस्ताव राज्यपाल और कुलाधिपति मंगुभाई पटेल के पास भेज दिया गया है।विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक में तर्क दिया गया कि राजा भोज का नाम प्रदेश की ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत का प्रतीक है। इसी आधार पर विश्वविद्यालय को उनके नाम से जोड़ने की बात रखी गई।सिर्फ नाम ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के अकादमिक ढांचे में भी बदलाव तय किए गए हैं। अरबी और पर्शियन जैसे पारंपरिक विषयों को एक साथ लाकर ‘तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति विभाग’ के रूप में पुनर्गठित किया जाएगा। बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल मध्य प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित एक सरकारी (सार्वजनिक) विश्वविद्यालय है। इसका प्रबंधन और वित्तपोषण राज्य सरकार द्वारा किया जाता है और यह एक सार्वजनिक संस्थान के रूप में संचालित होता है।
विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की सदस्य डॉ. ताहिरा अब्बासी ने इस फैसले का विरोध किया है। उन्होंने कहा- विश्वविद्यालय का मौजूदा नाम गदर पार्टी के संस्थापक सदस्य, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और भारत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री बरकतउल्ला भोपाली की स्मृति से जुड़ा है, जिसे बदला जाना उचित नहीं होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि नया नाम देना ही है तो किसी नए विश्वविद्यालय को दिया जाए।
सरकारी यूनिवर्सिटी का नाम कैसे बदला जाता है
किसी सरकारी विश्वविद्यालय का नाम बदलना सिर्फ घोषणा भर नहीं होता, बल्कि इसके लिए पूरी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सबसे पहले विश्वविद्यालय की कार्य परिषद या एग्जीक्यूटिव काउंसिल में नाम परिवर्तन का प्रस्ताव रखा जाता है। परिषद से मंजूरी मिलने के बाद यह प्रस्ताव राज्य के उच्च शिक्षा विभाग और फिर सरकार के पास भेजा जाता है।
अधिकांश सरकारी विश्वविद्यालय राज्य सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियमों के तहत संचालित होते हैं, इसलिए नाम बदलने के लिए संबंधित कानून में संशोधन जरूरी है। इसके लिए विधानसभा में संशोधन विधेयक पेश किया जाता है। विधानसभा से विधेयक पारित होने और राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी करती है। अधिसूचना प्रकाशित होते ही विश्वविद्यालय का नया नाम आधिकारिक रूप से लागू हो जाता है। इसके बाद विश्वविद्यालय की वेबसाइट, डिग्री, प्रमाणपत्र, रिकॉर्ड और अन्य सरकारी दस्तावेजों में नया नाम अपडेट किया जाता है।
उल्लेखनीय है मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और प्रखर राष्ट्रवादी थे। भारत की पहली निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, 1 दिसंबर 1915 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में ‘भारत की पहली अंतरिम (निर्वासित) सरकार’ का गठन किया गया था। इस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप सिंह थे और मौलाना बरकतुल्लाह इसके पहले प्रधानमंत्री बने थे।
उन्होंने सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में लाला हरदयाल और तारकनाथ दास जैसे दिग्गज क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ‘गदर पार्टी’ की स्थापना और उसकी क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रसार में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मौलाना बरकतुल्लाह उर्दू, अंग्रेजी, अरबी, फारसी, तुर्की और जापानी समेत 8 भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय में ‘हिंदुस्तानी’ (उर्दू/हिंदी) के प्रोफेसर के रूप में भी अध्यापन कार्य किया था।
अपनी मातृभूमि को आजाद कराने के लिए वे बंजारों की तरह एक देश से दूसरे देश (इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, जर्मनी, तुर्की और रूस) भटकते रहे। वे सोवियत संघ के कम्युनिस्ट नेता व्लादिमीर लेनिन से मुलाकात कर भारत की आजादी के लिए समर्थन मांगने वाले शुरुआती भारतीयों में से एक थे।
उन्होंने विदेशों से ‘इस्लामिक फ्रेटर्निटी’ और ‘अल-इस्लाम’ जैसे समाचार पत्र-पत्रिकाएं निकालीं। इनके माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ तीखे लेख लिखे, जिसके कारण ब्रिटिश हुकूमत ने उनके भारत आने पर प्रतिबंध लगा दिया था। भारत की आजादी का सपना आंखों में लिए ही 20 सितंबर 1927 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में उनका निधन हो गया। उन्हें कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो में दफनाया गया था।उनके इसी अद्वितीय और अविस्मरणीय योगदान को सम्मान देने के लिए वर्ष 1988 में भोपाल विश्वविद्यालय का नाम बदलकर बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय किया गया था।
बस अब जिम्मेदार लोगों ने सोचा कि बहुत हुआ सम्मान अब इनका नाम बदल देना चाहिए तो अब बदल दिया।
इस विश्वविद्यालय का पुराना नाम देश के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना बरकतउल्लाह भोपाली के नाम पर था। 7 जुलाई 1854 को भोपाल में जन्मे मौलाना बरकतउल्लाह एक प्रखर राष्ट्रवादी, महान क्रांतिकारी, विद्वान और निर्भीक पत्रकार थे। वे 8 भाषाओं के जानकार और बेहद प्रभावशाली वक्ता थे। उन्होंने भारत की आजादी के लिए विदेशों में रहकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी।
1988 में मिला था ‘बरकतउल्लाह’ नाम
भोपाल के इस प्रमुख उच्च शिक्षा केंद्र की स्थापना साल 1970 में ‘भोपाल विश्वविद्यालय’ के रूप में हुई थी। इसके बाद, मौलाना बरकतउल्लाह के देश की आजादी में दिए गए अद्वितीय योगदान को सम्मान देने के लिए साल 1988 में इसका नाम बदलकर ‘बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय’ किया गया था।
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1854 |
भोपाल में महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना बरकतउल्लाह का जन्म हुआ। |
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1915 |
काबुल (अफगानिस्तान) में बनी भारत की पहली अस्थायी सरकार में मौलाना बरकतउल्लाह प्रधानमंत्री बने। |
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1970 |
भोपाल में इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की स्थापना ‘भोपाल विश्वविद्यालय‘ के नाम से हुई। |
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1988 |
विश्वविद्यालय का नाम बदलकर क्रांतिकारी मौलाना बरकतउल्लाह के नाम पर रखा गया। |
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2026 (अब) |
कार्य परिषद की बैठक में नाम बदलकर ‘वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय‘ करने का प्रस्ताव पास हुआ। |
क्या है नए नाम ‘वाग्देवी भोजपाल’ का मतलब?
विश्वविद्यालय को दिया गया नया नाम ‘वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय’ इसके ऐतिहासिक और प्राचीन स्वरूप को दर्शाता है। इसमें शामिल ‘वाग्देवी’ शब्द ज्ञान, कला और बुद्धि की देवी मां सरस्वती का प्रतीक है। वहीं ‘भोजपाल’ शब्द भोपाल के प्राचीन इतिहास और राजा भोज के काल से सीधा संबंध जोड़ता है।
महान स्वतंत्रता सेनानी बरकतउल्ला भोपाली के नाम पर रखा यूनिवर्सिटी का नाम बदलने का प्रस्ताव -स्वतंत्रता सेनानी का अपमान ,बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम कायम रहे -भाकपा
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने के कार्य परिषद के प्रस्ताव को अनुचित और भारत के महान स्वाधीनता सेनानी काअपमान बताया है और मध्य प्रदेश सरकार से इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने की मांग की है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मध्य प्रदेश के राज्य सचिव कॉमरेड शैलेन्द्र शैली ने यहां जारी एक विज्ञप्ति में बताया कि ” महान शिक्षाविद्,स्वाधीनता सेनानी बरकत उल्ला भोपाली भोपाल के महान सपूत थे ,जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए सारी दुनिया में जाकर जुझारू सेनानी के रूप में काम किया।वे भारत की आज़ादी के आन्दोलन के दौरान गठित प्रथम निर्वासित सरकार के प्रधान मंत्री थे ।सारी दुनिया में भोपाल का नाम सबसे पहले बरकतउल्ला भोपाली के नाम से ही जाना गया ।विश्वविद्यालय की कार्य परिषद का नाम बदलने सम्बन्धी प्रस्ताव अनुचित और भोपाल के महान सपूत का अपमान है।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इसकी कड़ी भर्त्सना करती है।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मध्य प्रदेश सरकार से मांग है कि विश्वविद्यालय की कार्य परिषद के इस अनुचित प्रस्ताव को अस्वीकार किया जाए ।बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा कड़ा विरोध किया जाएगा ।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने सभी विपक्षों राजनीतिक दलों, शैक्षणिक संस्थाओं,जन संगठनों से अपील की है कि बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के नाम बदलने के प्रस्ताव के खिलाफ लामबंद हों । ”






