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मिट्टी के गणेश केवल प्रतिमा नहीं, बल्कि बदलती सोच का प्रतीक बन सकते हैं

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कांतिलाल मांडोत

गणेशोत्सव केवल भगवान गणेश की आराधना का पर्व नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के साथ जुड़ाव का भी उत्सव है। हर वर्ष गणेश चतुर्थी के साथ देशभर में लाखों घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणेश प्रतिमाओं की स्थापना होती है। श्रद्धालु पूरी आस्था और उत्साह के साथ भगवान गणेश का पूजन करते हैं और उत्सव के समापन पर प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं। लेकिन बदलते समय के साथ इस धार्मिक परंपरा के सामने पर्यावरण संरक्षण की एक बड़ी चुनौती भी खड़ी हुई है। यही कारण है कि अब गणेशोत्सव को ऐसी दिशा देने की जरूरत है, जिसमें आस्था भी बनी रहे और प्रकृति की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
गणेशोत्सव का आगाज होने वाला है और ऐसे समय में पूरे देश को एक ऐसा संकल्प लेने की जरूरत है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बने। यह संकल्प मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की स्थापना का होना चाहिए। यदि घर-घर और सार्वजनिक आयोजनों में मिट्टी के गणेश को प्राथमिकता दी जाए तो धार्मिक आस्था के साथ जल, मिट्टी और जलीय जीवों की रक्षा का संदेश भी मजबूत होगा। गणेशजी को विघ्नहर्ता कहा जाता है और आज सबसे बड़ा विघ्न प्रदूषण का बढ़ता संकट है। ऐसे में पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमा की स्थापना वास्तव में प्रकृति की रक्षा की दिशा में एक सार्थक धार्मिक पहल बन सकती है।
हाल ही में धरमपुर में आयोजित इको फ्रेंडली गणेश मेकिंग वर्कशॉप ने इसी सोच को जमीन पर उतारने का सुंदर प्रयास किया। लेडी विल्सन म्यूजियम और धरमपुर नगर पालिका संचालित एसएमएसएन बाल लाइब्रेरी के संयुक्त आयोजन में बच्चों और नागरिकों ने प्राकृतिक मिट्टी से गणेश प्रतिमाएं बनाईं। करीब 85 प्रतिभागियों की भागीदारी यह बताती है कि समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और यदि बच्चों तथा नई पीढ़ी को सही दिशा दिखाई जाए तो वे परंपरा और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन स्थापित कर सकते हैं। इस तरह के आयोजन केवल मूर्ति बनाने की कला सिखाने तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे समाज में एक विचार को जन्म देते हैं।

सबसे बड़ा सवाल गणेश प्रतिमाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का है। प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी प्रतिमाएं देखने में आकर्षक और आसानी से तैयार होने वाली हो सकती हैं, लेकिन उनके विसर्जन के बाद पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीओपी पानी में आसानी से प्राकृतिक रूप से नहीं घुलता। इसके साथ ही कई प्रतिमाओं पर इस्तेमाल किए जाने वाले रासायनिक रंग और अन्य सामग्री जल की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। जब बड़ी संख्या में प्रतिमाओं का विसर्जन नदियों, तालाबों, झीलों और अन्य जलस्रोतों में होता है तो वहां प्रदूषण का दबाव बढ़ जाता है।
जलस्रोत केवल इंसानों के लिए पानी का माध्यम नहीं हैं। वे असंख्य जलीय जीवों और वनस्पतियों का घर भी हैं। पानी में जाने वाली ऐसी सामग्री जो प्राकृतिक रूप से आसानी से नष्ट नहीं होती, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए परेशानी पैदा कर सकती है। रासायनिक रंगों और अन्य गैर-प्राकृतिक पदार्थों से जल की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है। इससे मछलियों सहित दूसरे जलीय जीवों के जीवन पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए गणेश प्रतिमा की सामग्री का चयन केवल धार्मिक या सौंदर्य का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह पर्यावरणीय जिम्मेदारी का भी विषय बन चुका है।
इसके मुकाबले प्राकृतिक मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल विकल्प प्रस्तुत करती है। मिट्टी प्रकृति का हिस्सा है और उचित परिस्थितियों में पानी के संपर्क में आने पर प्राकृतिक रूप से वापस मिट्टी में मिल सकती है। इसका अर्थ यह है कि श्रद्धा से स्थापित की गई प्रतिमा उत्सव के बाद प्रकृति पर लंबे समय तक बोझ नहीं बनती। यही कारण है कि मिट्टी के गणेश की स्थापना को केवल एक फैशन या अभियान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे हमारी धार्मिक परंपरा को प्रकृति के साथ जोड़ने वाली जिम्मेदार पहल के रूप में अपनाने की जरूरत है।
मिट्टी के गणेश का एक बड़ा लाभ यह भी है कि इससे स्थानीय कारीगरों और पारंपरिक शिल्प को प्रोत्साहन मिलता है। जब लोग प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमाओं को प्राथमिकता देंगे तो स्थानीय मूर्तिकारों के लिए रोजगार और आय के अवसर बढ़ेंगे। गांवों और छोटे शहरों में पारंपरिक रूप से प्रतिमा बनाने वाले कारीगरों की कला को भी संरक्षण मिलेगा। गणेशोत्सव के माध्यम से स्थानीय कला और संस्कृति को मजबूत करना भी इस पहल का महत्वपूर्ण पक्ष हो सकता है।
मिट्टी की प्रतिमा बनाने की प्रक्रिया बच्चों के लिए भी रचनात्मक और शिक्षाप्रद अनुभव बन सकती है। धरमपुर की कार्यशाला में बच्चों ने अपने हाथों से गणेश प्रतिमाएं तैयार कीं और उन्हें घर ले जाकर स्थापित करने का संकल्प लिया। इस तरह की गतिविधियां बच्चों को केवल धार्मिक भावना से नहीं जोड़तीं, बल्कि उन्हें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाती हैं। जिस बच्चे ने अपने हाथों से मिट्टी के गणेश बनाए होंगे, उसके लिए प्रतिमा और प्रकृति के बीच संबंध को समझना कहीं अधिक सहज होगा।
गणेशोत्सव के दौरान पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल प्रशासन या नगर निकाय की नहीं हो सकती। इसमें समाज के प्रत्येक वर्ग की भूमिका है। परिवार यदि मिट्टी की प्रतिमा खरीदने या बनाने का निर्णय लेते हैं तो यह बदलाव की शुरुआत होगी। स्कूल और सामाजिक संस्थाएं बच्चों के लिए मिट्टी की गणेश प्रतिमा बनाने की कार्यशालाएं आयोजित कर सकती हैं। धार्मिक संस्थाएं और गणेश मंडल भी पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाओं को प्रोत्साहित कर सकते हैं। स्थानीय प्रशासन जलस्रोतों की स्वच्छता और सुरक्षित विसर्जन की व्यवस्था के साथ लोगों को प्राकृतिक प्रतिमाओं के उपयोग के लिए जागरूक कर सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण को धार्मिक आस्था के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आस्था और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को सदैव सम्मान दिया गया है। पेड़-पौधे, नदियां, पर्वत और जलस्रोत हमारे सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। भगवान गणेश स्वयं प्रकृति से जुड़े अनेक प्रतीकों के साथ पूजे जाते हैं। ऐसे में उनके उत्सव को प्रकृति के अनुकूल बनाना हमारी परंपरा की भावना के और करीब ले जाता है।
आज आवश्यकता केवल एक वर्ष मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने की नहीं, बल्कि इसे स्थायी सामाजिक संकल्प बनाने की है। यदि एक परिवार से शुरुआत होती है तो धीरे-धीरे पूरा मोहल्ला, शहर और फिर पूरा समाज इससे जुड़ सकता है। आने वाले वर्षों में ऐसा समय आ सकता है जब गणेशोत्सव की पहचान ही पर्यावरण अनुकूल उत्सव के रूप में होने लगे। जब लोग गर्व से कहें कि उनके घर में स्थापित गणेशजी मिट्टी से बने हैं और विसर्जन के बाद वे प्रकृति में ही समा जाएंगे, तब यह उत्सव वास्तव में एक नए सामाजिक बदलाव का प्रतीक बनेगा।
गणेशजी विघ्नहर्ता हैं। आज प्रदूषित होते जलस्रोत, घटती जल गुणवत्ता और प्रकृति पर बढ़ता दबाव हमारे सामने बड़ी चुनौती हैं। इन चुनौतियों को कम करने में हर छोटा कदम महत्वपूर्ण है। मिट्टी के गणेश की प्रतिमा स्थापित करना भले ही छोटा संकल्प दिखाई दे, लेकिन करोड़ों परिवार इसे अपना लें तो इसका प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। इसलिए इस गणेशोत्सव पर घर-घर से यही आवाज उठनी चाहिए कि आस्था भी रहे, परंपरा भी रहे और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।
मिट्टी के गणेश केवल प्रतिमा नहीं, बल्कि बदलती सोच का प्रतीक बन सकते हैं। यह संकल्प भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा को कम नहीं करता, बल्कि श्रद्धा को प्रकृति की सेवा से जोड़ता है। गणेशोत्सव की सच्ची सार्थकता तभी होगी, जब उत्सव के बाद हमारे जलस्रोत पहले से अधिक स्वच्छ रहें, जलीय जीवन सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियां भी उसी निर्मल प्रकृति का आनंद ले सकें, जिसकी रक्षा की जिम्मेदारी आज हमारे हाथों में है। इस बार गणेशजी को घर लाते समय एक संकल्प भी साथ लाना होग।गणेशजी मिट्टी के होंगे और हमारा उत्सव प्रकृति के हित में होगा।

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