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अभिजीत दीपके द्वारा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के व्यंगात्मक इस्तीफे ने राजनीतिक गलियारे में हलचल मचा दी

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श्याम लाल शर्मा / नई दिल्ली 

मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल के नाम लिखे गए मुख्यमंत्री के एक प्रतीकात्मक इस्तीफे ने राजनीतिक गलियारे में हलचल मचा दी।जिसमे लिखा था ‘मैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूं..।’ दरअसल यह कोई असली मुख्यमंत्री का इस्तीफा नहीं, बल्कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के संस्थापक और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके का मध्य प्रदेश सरकार पर कसा गया एक तीखा व्यंगात्मक प्रहार था ।दीपके ने खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए राज्यपाल मंगुभाई पटेल के नाम एक प्रतीकात्मक ‘इस्तीफा’ लिखा और इसे अपने X अकाउंट पर पोस्ट किया। उन्होंने पत्र पर साफ तौर पर ‘satire’ यानि हास्य व्यंग भी लिखा गया है।दीपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए लिखा कि वे तत्काल प्रभाव से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं और प्रदेश की जनता की सेवा करने का अवसर देने के लिए प्रधानमंत्री का धन्यवाद करते हैं। अभिजीत दीपके ने  यह पूरा पत्र सरकार पर सवाल उठाने के लिए व्यंग्य के तौर पर तैयार किया और पोस्ट किया है। इसके पीछे मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत और वहां के बदहाल स्वास्थ्य ढांचे के विरोध में ‘इस्तीफा पत्र’ लिखकर राज्य सरकार की लाचारी पर सवाल उठाए हैं।

अभिजीत दीपके ने तंज भरे व्यंगात्मक लहजे में मध्य प्रदेश के राज्यपाल को संबोधित करते हुए खुद को बतौर  ‘मुख्यमंत्री’ बताते हुए लिखा, ‘मुख्यमंत्री के रूप में, मैं इन बच्चों को समय पर उचित चिकित्सा देखभाल और सहायता प्रदान करने में विफल रहने की पूरी जिम्मेदारी स्वीकार करता हूं।’ इसके साथ ही उन्होंने सरकार द्वारा घोषित मुआवजे और ‘हर घर नल से जल’ के दावों पर कड़ा तंज कसते हुए कहा कि आज भी बालाघाट के कई आदिवासी परिवार पीने के पानी के लिए नदियों और नालों पर निर्भर हैं।दीपके ने पत्र में बालाघाट के कुछ आदिवासी इलाकों में पेयजल की स्थिति पर भी सवाल उठाया। उनका दावा है कि ‘हर घर नल योजना’ के बावजूद कुछ परिवार पीने के पानी के लिए नदी पर निर्भर हैं। शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने आरोप लगाए। दीपके के मुताबिक बालाघाट के एक गांव में आंगनवाड़ी से कक्षा पांचवीं तक करीब 75 बच्चे एक ही कमरे में पढ़ रहे हैं और स्थानीय लोगों की मांग के बावजूद उचित स्कूल भवन उपलब्ध नहीं कराया गया। पत्र में उन्होंने मध्य प्रदेश में बिजली से वंचित आदिवासी परिवारों, अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराध और कुपोषण से जुड़े आंकड़ों का भी उल्लेख करते हुए सरकार को घेरा है। ये आंकड़े और दावे दीपके द्वारा जारी व्यंग्यात्मक पत्र का हिस्सा हैं।

13 अगस्त 2026 की तारीख वाले इस पत्र में दीपके ने बालाघाट में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत का उल्लेख करते हुए स्वास्थ्य सुविधाओं और समय पर इलाज को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने व्यंग्यात्मक रूप से इन मौतों की जिम्मेदारी खुद पर लेते हुए लिखा कि उनका ‘विवेक’ उन्हें पद पर बने रहने की अनुमति नहीं देता। दीपके ने मुआवजे का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने दावा किया कि शुरुआत में प्रत्येक बच्चे के परिवार के लिए ₹2 लाख की सहायता घोषित की गई थी, जिसे आदिवासी समुदाय के विरोध के बाद बढ़ाकर ₹4 लाख किया गया। इसी आधार पर उन्होंने सवाल किया कि यदि ये मंत्री या विधायकों के बच्चे होते तो क्या ₹4 लाख के मुआवजे को पर्याप्त माना जाता?

यह पूरा विवाद बालाघाट जिले के बैगा और गोंड आदिवासी समुदायों के 30 से अधिक बच्चों की संदिग्ध मौत (खसरा और मलेरिया के प्रकोप) के बाद खड़ा हुआ है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य के स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग और बालाघाट कलेक्टर से जवाब तलब किया है। कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) के मुताबिक, 50 बेड की क्षमता वाले अस्पताल में करीब 400 मासूम बच्चों का इलाज चल रहा है, जिससे साफ होता है कि वहां स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी बदहाल हैं।

अभिजीत दीपके शनिवार को बालाघाट पहुंचे थे और बैहर विधानसभा क्षेत्र के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में गए।उन्होंने बोंडरी और कोरका गांव के लोगों से मुलाकात की और बच्चों की मौत के कारणों तथा स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर जानकारी जुटाई।इस दौरान एक सोशल मीडिया पत्रकार ने दीपके से बच्चों की मौत जैसे संवेदनशील मामले पर राजनीति करने को लेकर सवाल भी किया और पूछा कि वे घटना के इतने दिन बाद क्यों पहुंचे।दीपके इस सवाल का जवाब दिए बिना आगे बढ़ गए।दिलचस्प बात यह है कि पत्रकारों को जो सवाल मुख्यमंत्री से करना चाहिए वह दीपके से कर रहे थे जब कि न तो वह मध्यप्रदेश से ताल्लुक रखते हैं और ना ही किसी पद पर हैं।

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