
प्रोफेसर हंसराज सुमन
भाषा न केवल विचारों की अभिव्यक्ति का साधन है, अपितु यह ज्ञान के सृजन, सामाजिक चेतना के संवर्धन, नीतियों के कार्यान्वयन और लोकतांत्रिक संवाद का आधार भी है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में भाषा की भूमिका इस तथ्य से निर्धारित होती है कि वह ज्ञान एवं शासन की संस्थाओं को सामान्य नागरिक से किस सीमा तक संबद्ध कर पाती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में यह प्रश्न अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। हिंदी भारत की प्रमुख भाषाओं में से एक होने के साथ-साथ व्यापक जनसमुदाय के मध्य संपर्क, संचार, शिक्षा, पत्रकारिता और सार्वजनिक विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम है। अतः शोध, नीति-निर्माण और जनसंवाद के क्षेत्रों में हिंदी की भूमिका का विस्तार मात्र एक भाषाई विषय न होकर, ज्ञान के लोकतंत्रीकरण और सामाजिक समावेशन का भी प्रश्न है। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत, हिंदी को संघ की राजभाषा का संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत, संघ की राजभाषा हिंदी तथा लिपि देवनागरी के रूप में स्थापित की गई। इसी के साथ, भारत की भाषाई विविधता के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए, अन्य भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु एक संवैधानिक संरचना भी निर्मित की गई। अतः, हिंदी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के प्रतिकूल न होकर, भारत की बहुभाषी व्यवस्था के सह-अस्तित्व और पारस्परिक सहयोग के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
आज की डिजिटल क्रांति, जिसमें इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और ऑनलाइन शिक्षा का व्यापक विस्तार हुआ है, ने हिंदी के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। इसके विपरीत, उच्च शिक्षा और शोध में अंग्रेजी की प्रधानता, तकनीकी शब्दावली की जटिलता, गुणवत्तापूर्ण अनुवादों का अभाव और डिजिटल संसाधनों की असमान पहुँच जैसी चुनौतियाँ भी बनी हुई हैं। इसलिए, वर्तमान समय में यह आवश्यक है कि हिंदी को ज्ञान-विज्ञान, नीति-निर्धारण और जनसंवाद के लिए एक सशक्त भाषा के रूप में विकसित किया जाए।
1. शोध के क्षेत्र में हिंदी की भूमिका –
शोध किसी भी समाज के बौद्धिक उन्नयन का आधार होता है। इसके माध्यम से नवीन ज्ञान का सृजन, पूर्व-स्थापित ज्ञान का पुनर्मूल्यांकन तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान की खोज की जाती है। यदि शोध की भाषा समाज के एक बड़े वर्ग के लिए दुरूह हो जाए, तो ज्ञान का प्रसार सीमित दायरे में ही सिमट कर रह सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में हिंदी शोध को व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हिंदी में साहित्य, इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, दर्शनशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, पत्रकारिता, संस्कृति एवं लोकजीवन से संबंधित एक विस्तृत शोध-परंपरा विकसित हुई है। हिंदी भाषी विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों में निरंतर शोधकार्य संपन्न हो रहे हैं । भारतीय समाज की स्थानीय समस्याओं, ग्रामीण जीवन, लोक-संस्कृति , जातीय-सामाजिक संरचना, स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी जीवन, तृतीय लिंगी विमर्श, पर्यावरण, शिक्षा तथा मीडिया जैसे विषयों पर हिंदी में महत्वपूर्ण सामग्री सुलभ है।
हिंदी में शोध का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यह शोधकर्ताओं को स्थानीय अनुभवों और सामाजिक वास्तविकताओं को उनके स्वाभाविक भाषाई-सांस्कृतिक संदर्भ में व्यक्त करने में सक्षम बनाता है। उदाहरण के तौर पर, ग्रामीण समाज, लोक भाषाओं, लोक कथाओं, लोक विश्वासों, या क्षेत्रीय सामाजिक संरचनाओं पर शोध करते समय, हिंदी और उसकी बोलियों का ज्ञान शोधकर्ता को अधिक प्रामाणिक सामग्री तक पहुंच प्रदान करता है। उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में हिंदी को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और तकनीकी विषयों में अंग्रेजी का प्रभुत्व अभी भी बना हुआ है। हिंदी में उच्च-स्तरीय पाठ्यपुस्तकों, शोध-पत्रिकाओं, संदर्भ ग्रंथों और अद्यतन डिजिटल सामग्री की अपेक्षाकृत कमी है। इसके अतिरिक्त, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली में एकरूपता का अभाव भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस समस्या का निराकरण मात्र अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने से संभव नहीं होगा। हिंदी में मौलिक अनुसंधान को बढ़ावा देना परमावश्यक है। विश्वविद्यालयों को हिंदी में उच्च गुणवत्ता वाली शोध-पत्रिकाओं का विकास , प्रकाशन करना चाहिए तथा शोधकर्ताओं को भारतीय भाषाओं में शोध-कार्य करने हेतु प्रेरित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, हिंदी शोध को अंतरराष्ट्रीय पटल पर प्रस्तुत करने के लिए द्विभाषी अथवा बहुभाषी प्रकाशन की व्यवस्था स्थापित की जा सकती है।
डिजिटल तकनीक इस क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है। ऑनलाइन पुस्तकालय, डिजिटल संग्रह, ई-जर्नल, ई-पुस्तकें, ओपन एक्सेस, मशीनी अनुवाद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित भाषा उपकरण हिंदी में शोध को अधिक सुगम बना सकते हैं। यदि शोध सामग्री हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यमों में उपलब्ध हो, तो स्थानीय ज्ञान वैश्विक शैक्षणिक समुदाय तक तथा वैश्विक ज्ञान भारतीय समाज तक अधिक प्रभावी ढंग से संप्रेषित हो सकता है।
2. नीति-निर्माण में हिंदी की भूमिका –
नीति-निर्माण लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का एक केंद्रीय पहलू है। सरकार द्वारा तैयार की गई नीतियाँ तभी सफल हो सकती हैं जब नागरिक उन्हें भली-भांति समझ सकें। यदि किसी नीति का लक्ष्य नागरिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है, तो उसकी भाषा नागरिकों के लिए सहज और सुबोध होनी चाहिए।
भारत की प्रशासनिक प्रणाली लंबे समय तक अंग्रेजी भाषा और औपनिवेशिक प्रशासनिक परंपराओं से प्रभावित रही है। इस कारणवश, सरकारी दस्तावेजों की भाषा प्रायः सामान्य नागरिकों के लिए जटिल और तकनीकी रही है। हिंदी का प्रभावी उपयोग इस खाई को पाटने में सहायक सिद्ध हो सकता है। यदि योजनाओं, कानूनों, सरकारी दिशानिर्देशों, अधिकारों और सेवाओं से संबंधित जानकारी सरल एवं स्पष्ट हिंदी में उपलब्ध हो, तो नागरिकों की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा। नीति निर्माण के तीन महत्वपूर्ण चरण होते हैं: उसका गठन, उसका कार्यान्वयन, और उसका मूल्यांकन। इन तीनों ही स्तरों पर भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। नीति निर्माण प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उनकी भाषाओं में संवाद स्थापित करना अनिवार्य है। नीति के क्रियान्वयन हेतु अधिकारियों और नागरिकों के मध्य स्पष्ट संचार अपरिहार्य है। इसी प्रकार, नीति के मूल्यांकन के दौरान जनता से प्राप्त प्रतिक्रिया अत्यधिक मूल्यवान होती है।
हिंदी का प्रयोग उन राज्यों और क्षेत्रों में विशेष रूप से लाभकारी है जहाँ हिंदी समझने वाले लोगों की संख्या अधिक है। केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के प्रचार-प्रसार में हिंदी का व्यापक उपयोग किया जाता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, महिला एवं बाल विकास, रोजगार, डिजिटल सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित योजनाओं की जानकारी सरल हिंदी में उपलब्ध कराने से नीति का सामाजिक प्रभाव काफी बढ़ सकता है। किंतु, इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सावधानी बरतना आवश्यक है। भारत की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए, हिंदी को एकमात्र प्रशासनिक या जनसंचार भाषा के रूप में देखना उचित नहीं होगा। एक प्रभावी नीति-व्यवस्था के लिए हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय और अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग अनिवार्य है। वास्तव में, हिंदी एक संपर्क भाषा और सेतु के रूप में कार्य कर सकती है, जो विभिन्न भाषाई समुदायों के बीच संवाद को सुदृढ़ करेगी।
नीति-निर्माण प्रक्रिया में हिंदी भाषा के विकास हेतु सरल हिंदी पर विशेष ध्यान देना अपेक्षित है। अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ, जटिल एवं प्रशासनिक शब्दावली सामान्य नागरिक को नीतियों से विमुख कर सकती है। दृष्टांत स्वरूप, “अनुदान “, ” प्रावधान “, ” अधिसूचना ” जैसे शब्द यद्यपि प्रशासनिक संदर्भ में अनिवार्य हो सकते हैं, तथापि इनके साथ सरल स्पष्टीकरण उपलब्ध कराना नागरिक-केंद्रित शासन हेतु अधिक श्रेयस्कर होगा।
इस परिप्रेक्ष्य में, भाषा का प्रश्न मात्र शब्दावली का विषय न होकर, लोकतांत्रिक पारदर्शिता का प्रश्न भी है। ऐसी नीतिगत भाषा जो नागरिक को बोधगम्य न हो, व्यवहार में नागरिक अधिकारों तक उनकी पहुँच को सीमित कर सकती है।
3. जनसंवाद में हिंदी की भूमिका –
लोकतंत्र की जीवंतता जनसंवाद पर निर्भर करती है। लोकतंत्र का सार केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों और शासन के मध्य सतत संवाद ही इसकी वास्तविक शक्ति है। इस संवाद प्रक्रिया में भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में जनचेतना के निर्माण में हिंदी पत्रकारिता का ऐतिहासिक योगदान रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, हिंदी समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और साहित्य ने राष्ट्रीय भावना को सुदृढ़ करने में महती भूमिका निभाई है । स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भी, हिंदी पत्रकारिता ने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सरोकारों को जनता के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। रेडियो, टेलीविजन और तत्पश्चात इंटरनेट के आगमन से हिंदी जनसंवाद का दायरा और विस्तृत हुआ है। वर्तमान में, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, वीडियो चैनल, ब्लॉग, पॉडकास्ट और डिजिटल समाचार माध्यम हिंदी में प्रचुर मात्रा में सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। स्मार्टफोन की सुलभता और सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता ने हिंदी डिजिटल सामग्री के उपभोक्ताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
सोशल मीडिया ने जनसंवाद की प्रकृति को रूपांतरित कर दिया है। पूर्व में सूचना का प्रवाह मुख्यतः संस्थागत स्रोतों से जनता की ओर होता था; अब नागरिक स्वयं भी सूचना प्रदाता बन गए हैं। हिंदी में नागरिक पत्रकारिता, वीडियो रिपोर्टिंग, ऑनलाइन वाद-विवाद और सामाजिक अभियानों ने सार्वजनिक विमर्श को अधिक सहभागितापूर्ण बनाया है। यद्यपि, इसके साथ अनेक चुनौतियाँ भी सम्बद्ध हैं। सोशल मीडिया पर असत्य सूचनाएँ, अफवाहें, भ्रामक शीर्षक, अपूर्ण जानकारियाँ और कृत्रिम रूप से सृजित सामग्री अत्यंत तीव्र गति से प्रसारित हो सकती हैं। अतः, हिंदी जनसंवाद के संदर्भ में मीडिया साक्षरता और तथ्य-जाँच की संस्कृति का विकास अपरिहार्य है। भाषा की व्यापकता के साथ-साथ, उसके माध्यम से प्रसारित होने वाली गलत सूचना का प्रभाव भी उतना ही विस्तृत हो सकता है। इसलिए, हिंदी जनसंवाद का उद्देश्य मात्र अधिक सामग्री का सृजन करना नहीं, अपितु विश्वसनीय, तथ्यपरक और उत्तरदायी सामग्री का निर्माण करना होना चाहिए। पत्रकारिता संस्थानों, विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज संगठनों को मिलकर हिंदी में तथ्य-जाँच, मीडिया साक्षरता और डिजिटल नागरिकता से संबंधित कार्यक्रमों को विकसित करने की दिशा में कार्य करना चाहिए।
4. हिंदी और ज्ञान का लोकतंत्रीकरण-
शोध, नीति एवं जनसंवाद—इन तीनों क्षेत्रों को जोड़ने वाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकल्पना ” ज्ञान का लोकतंत्रीकरण ” है। ज्ञान तभी लोकतांत्रिक स्वरूप ग्रहण करता है जब वह समाज के विभिन्न वर्गों तक सुगमता से पहुंच सके। यदि अनुसंधान केवल ऐसी भाषा में उपलब्ध है जिसे सीमित व्यक्ति ही समझते हैं, तो उसका सामाजिक प्रभाव सीमित रहेगा। यदि शासकीय नीति जटिल भाषा में लिखी गई है, तो उसका लाभ उठाने में नागरिकों को कठिनाई का अनुभव होगा। यदि जनसंचार में प्रामाणिक ज्ञान उपलब्ध नहीं है, तो समाज अफवाहों एवं पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकता है। हिंदी इन तीनों स्तरों के मध्य सेतु का कार्य कर सकती है। विश्वविद्यालय में सृजित ज्ञान को हिंदी में सरलीकृत रूप में जनसामान्य तक पहुंचाया जा सकता है। शासकीय नीतियों को हिंदी में स्पष्टतापूर्वक समझाया जा सकता है। जनता की समस्याओं एवं अनुभवों को हिंदी के माध्यम से अनुसंधान एवं नीति-निर्माण तक प्रेषित किया जा सकता है। इस प्रकार हिंदी एक ” द्विमार्गीय सेतु ” के रूप में स्थापित हो सकती है—एक ओर ज्ञान एवं शासन से जनता की ओर तथा दूसरी ओर जनता के अनुभवों से अनुसंधान एवं नीति-निर्माण की ओर।
5. डिजिटल युग और हिंदी –
इक्कीसवीं सदी में भाषा के विकास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र डिजिटल संसार है। इंटरनेट के माध्यम से हिंदी के उपयोग में नवीन आयामों का सूत्रपात हुआ है। यूनिकोड का व्यापक प्रचलन, स्मार्टफोन का प्रयोग, वॉइस टाइपिंग की सुविधा, स्पीच-टू-टेक्स्ट तकनीक तथा मशीन अनुवाद ने हिंदी लेखन को तकनीकी दृष्टि से अधिक सुगम बनाया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिंदी भाषा के समक्ष नवीन संभावनाएँ प्रस्तुत कर रही है। मशीन अनुवाद की क्षमता, स्वचालित सारांश निर्माण, भाषण पहचान प्रणाली, पाठ विश्लेषण तथा संवादात्मक प्रणालियों के द्वारा हिंदी में ज्ञान की उपलब्धता में वृद्धि की जा सकती है। इससे उन व्यक्तियों को भी डिजिटल सेवाओं तक पहुँच प्राप्त हो सकेगी जो अंग्रेजी भाषा में सहज नहीं हैं। किंतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में हिंदी के समक्ष कुछ चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं, जिनमें डेटा की अपर्याप्तता, उच्च-गुणवत्ता वाले कॉर्पस का अभाव, विविध बोलियों की जटिलता तथा संदर्भ-संवेदनशील अनुवाद की समस्याएँ प्रमुख हैं। अतः हिंदी के डिजिटल भविष्य हेतु वृहद एवं विविध भाषाई डेटाबेस का निर्माण अपरिहार्य है।
6. हिंदी के सामने प्रमुख चुनौतियाँ –
शोध, नीति एवं जनसंवाद के क्षेत्र में हिंदी के विस्तार के उपरांत भी अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। सर्वप्रथम, उच्च शिक्षा एवं शोध के क्षेत्र में अंग्रेजी का प्रभुत्व एक प्रमुख चुनौती है। यद्यपि वैश्विक अकादमिक संवाद हेतु अंग्रेजी की उपादेयता निर्विवाद है, तथापि इसका तात्पर्य यह नहीं होना चाहिए कि भारतीय भाषाओं में उच्चस्तरीय ज्ञान-सृजन सीमित हो जाए। द्वितीय चुनौती गुणवत्तापूर्ण अनुवाद से संबंधित है। अक्षरशः अनुवाद प्रायः मूल विचार को विकृत कर देता है। वैज्ञानिक, विधिक एवं तकनीकी सामग्री के प्रभावी अनुवाद हेतु विषय-विशेषज्ञों एवं भाषाविदों के सहयोगात्मक प्रयास अपेक्षित हैं। तृतीय चुनौती पारिभाषिक शब्दावली के विकास से जुड़ी है। अत्यधिक क्लिष्ट शब्द सामान्य पाठक को विमुख कर सकते हैं, जबकि अत्यधिक बोलचाल की भाषा अकादमिक परिशुद्धता को प्रभावित कर सकती है। अतः संतुलित एवं संदर्भानुकूल शब्दावली का विकास आवश्यक है।
चतुर्थ चुनौती डिजिटल सामग्री की गुणवत्ता से संबंधित है। हिंदी इंटरनेट पर सामग्री की मात्रा में तीव्र वृद्धि हो रही है, परंतु गुणवत्तापूर्ण शोध सामग्री, प्रामाणिक संदर्भ एवं विश्वसनीय शैक्षिक संसाधनों की संख्या में और अधिक वृद्धि किए जाने की आवश्यकता है। पंचम चुनौती भाषाई विविधता से संबंधित है। हिंदी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के साथ संवाद एवं सहयोग के माध्यम से होना चाहिए। हिंदी की सक्षमता तभी बढ़ेगी जब वह भारतीय बहुभाषिकता का सम्मान करते हुए एक सेतु के रूप में कार्य करेगी।
7. भविष्य की दिशा-
भविष्य में हिंदी को शोध, नीति निर्धारण और जनसंवाद के एक अधिक प्रभावी माध्यम के रूप में स्थापित करने हेतु कुछ महत्वपूर्ण उपायों का क्रियान्वयन अपेक्षित है। सर्वप्रथम, विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में मौलिक शोध कार्यों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अनुसंधान के साथ-साथ उसके लोकप्रिय संस्करण का निर्माण भी संभव है, जिससे अकादमिक ज्ञान की सुलभता सामान्य नागरिक तक सुनिश्चित हो सके। द्वितीय, वैज्ञानिक एवं तकनीकी विषयों से संबंधित उच्च गुणवत्ता वाली पाठ्यपुस्तकों तथा डिजिटल संसाधनों का हिंदी में विकास किया जाना चाहिए। मात्र अनुवाद पर बल न देकर, भारतीय संदर्भों के अनुरूप मौलिक सामग्री का सृजन प्राथमिकता होनी चाहिए। तृतीय, सरकारी नीतियों एवं योजनाओं से संबंधित सूचना को ” सरल, सुस्पष्ट एवं नागरिक-केंद्रित हिंदी ” में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में भी सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। चतुर्थ, हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में तथ्य-जाँच, स्रोत-आधारित लेखन तथा मीडिया साक्षरता को बढ़ावा देना अनिवार्य है। पंचम, कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं भाषा-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी के लिए वृहद डिजिटल कॉर्पस, शब्दकोश, भाषाई डेटाबेस और ओपन-सोर्स उपकरणों का विकास किया जाना चाहिए। षष्ठम, हिंदी को वैश्विक मंच पर ज्ञान एवं संस्कृति की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। प्रवासी भारतीय समुदाय, अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों एवं डिजिटल माध्यमों के सहयोग से हिंदी की वैश्विक उपस्थिति को सशक्त किया जा सकता है।
निष्कर्ष –
शोध, नीति और जनसंवाद आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के तीन महत्वपूर्ण आधारस्तंभ हैं, और इन तीनों की सफलता के लिए भाषा की सुगमता एवं प्रभावशीलता नितांत आवश्यक है। हिंदी इन तीनों क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण सेतु भाषा की भूमिका निभा सकती है। शोध के क्षेत्र में, यह स्थानीय ज्ञान और अनुभवों को अकादमिक विमर्श से जोड़ सकती है। नीति के क्षेत्र में, यह शासन और नागरिकों के मध्य की दूरी को कम कर सकती है, और जनसंवाद के क्षेत्र में, यह लोकतांत्रिक भागीदारी तथा सामाजिक चेतना को व्यापक बना सकती है। यद्यपि, हिंदी का भविष्य केवल उसके बोलने वालों की संख्या से निर्धारित नहीं होगा। इसकी वास्तविक शक्ति इस बात पर निर्भर करेगी कि यह आधुनिक विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, शिक्षा और डिजिटल संचार की आवश्यकताओं को कितनी प्रभावी ढंग से पूर्ण कर पाती है। इसके लिए भाषा में वैज्ञानिकता, सरलता, आधुनिकता और समावेशिता का संतुलन अपरिहार्य है। हिंदी को विकसित करने का अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं को गौण करना नहीं है, अपितु इसका आशय भारत की बहुभाषी ज्ञान-व्यवस्था को सुदृढ़ करना है। यदि हिंदी भारतीय भाषाओं के बीच संवाद का सेतु बने, वैश्विक ज्ञान को भारतीय समाज तक पहुँचाए, और भारतीय अनुभवों को विश्व पटल पर प्रस्तुत करे, तो इसकी भूमिका और अधिक विस्तृत हो सकती है। अंततः, हिंदी की सार्थकता केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति में ही नहीं, बल्कि ज्ञान को समाज से जोड़ने की उसकी क्षमता में निहित है। शोध से नीति, नीति से जनजीवन और जनजीवन से पुनः शोध तक बनने वाला संवाद तभी सशक्त होगा जब भाषा उस संवाद की सहज वाहक बने। इस परिप्रेक्ष्य में, हिंदी केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, अपितु ज्ञान के लोकतंत्रीकरण, सहभागी शासन और एक जागरूक नागरिक समाज के निर्माण का महत्वपूर्ण उपकरण बन सकती है।
( लेखक , दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री अरबिंदो कॉलेज में प्रोफेसर व मीडिया विश्लेषक हैं )






