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25 साल में 14वीं बार धीमी हुई मानसून की चाल, फिर भी अच्छी बारिश की उम्मीद बरकरार ?

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देश में इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून की रफ्तार सामान्य वर्षों की तुलना में कुछ धीमी दिखाई दे रही है। मौसम के आंकड़ों के अनुसार 27 जून तक मानसून देश के लगभग 55 प्रतिशत हिस्से तक ही पहुंच पाया है। पिछले 25 वर्षों में यह 14वीं बार है जब मानसून की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी दर्ज की गई है। हालांकि शुरुआत की यह सुस्ती किसानों और आम लोगों के बीच चिंता का विषय बनी हुई है, लेकिन मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में परिस्थितियां अनुकूल रहने की संभावना है और देश के अधिकांश हिस्सों में अच्छी बारिश हो सकती है।

मानसून की धीमी चाल का सीधा असर खेती, जलाशयों के जलस्तर और पेयजल उपलब्धता पर पड़ता है। जिन राज्यों में खरीफ फसलों की बुआई मानसून पर निर्भर रहती है, वहां किसान बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। शुरुआती देरी के कारण कई क्षेत्रों में धान, मक्का, सोयाबीन और अन्य खरीफ फसलों की बुआई की गति प्रभावित हुई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई के पहले और दूसरे सप्ताह में अच्छी वर्षा होती है, तो खेती पर इसका बड़ा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मौसम विभाग को बेहतर बारिश की उम्मीद ?

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि मानसून की चाल भले ही फिलहाल धीमी हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे सीजन में बारिश कम होगी। कई बार मानसून शुरुआती दौर में कमजोर रहता है, लेकिन बाद के चरणों में तेज़ी पकड़ लेता है और सामान्य या उससे अधिक वर्षा दर्ज होती है। इस बार भी विभिन्न मौसम संकेतकों के आधार पर जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश की संभावना जताई जा रही है। यही वजह है कि अल नीनो जैसे वैश्विक मौसमीय प्रभावों की चर्चा के बावजूद देश में सामान्य से बेहतर वर्षा की उम्मीद बनी हुई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की प्रगति कई वायुमंडलीय और समुद्री परिस्थितियों पर निर्भर करती है। हवा की दिशा, समुद्र की सतह का तापमान, दबाव प्रणाली और बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में बनने वाले निम्न दबाव के क्षेत्र मानसून को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि ये परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो मानसून तेजी से आगे बढ़ सकता है और कम समय में देश के बड़े हिस्से को कवर कर सकता है। अच्छी बारिश का सबसे बड़ा लाभ कृषि क्षेत्र को मिलेगा। पर्याप्त वर्षा होने से फसलों की पैदावार बेहतर रहने की संभावना बढ़ेगी, जिससे किसानों की आय में सुधार हो सकता है। इसके अलावा जलाशयों में पानी का स्तर बढ़ने से सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन को भी मजबूती मिलेगी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

फिलहाल देश की नजरें जुलाई के मौसम पर टिकी हैं। यदि आने वाले दिनों में मानसून अपनी रफ्तार पकड़ लेता है, तो शुरुआती सुस्ती की भरपाई संभव है। मौसम विभाग भी लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और समय-समय पर पूर्वानुमान जारी कर रहा है। ऐसे में किसानों और आम नागरिकों के लिए सलाह यही है कि वे आधिकारिक मौसम अपडेट पर भरोसा करें और उसी के अनुसार अपनी कृषि एवं दैनिक गतिविधियों की योजना बनाएं।

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