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आरआईएस ने मनाया 44वाँ स्थापना दिवस, वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को सशक्त बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई

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चौथा अक्षर संवाददाता/नई दिल्ली

विकासशील देशों के लिए अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली (आरआईएस) ने अपना 44 वाँ स्थापना दिवस विशिष्ट नीति-निर्माताओं, राजनयिकों, विद्वानों, संस्थान के पूर्व सदस्यों, शासी परिषद तथा अनुसंधान सलाहकार परिषद के सदस्यों की गरिमामयी उपस्थिति में मनाया। इस अवसर पर वक्ताओं ने नीति अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय विकास सहयोग के क्षेत्र में आरआईएस के दीर्घकालिक योगदान पर प्रकाश डाला। स्थापना दिवस व्याख्यान को संबोधित करते हुए भारत सरकार के विदेश राज्य मंत्री श्री पबित्र मार्गेरिटा ने आरआईएस को 44 वर्षों की सफल यात्रा पूर्ण करने पर बधाई दी। उन्होंने माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की उस दृष्टि का उल्लेख किया, जिसके अनुसार भारत की विकास यात्रा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों सहित सम्पूर्ण विश्व की प्रगति से जुड़ी हुई है। उन्होंने साक्ष्य-आधारित नीति सुझावों और ज्ञान-संपदा के माध्यम से नीति-निर्माण प्रक्रिया को सुदृढ़ करने तथा वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की आवाज़ को मजबूत बनाने में आरआईएस की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना की।

           नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद ने आरआईएस के साथ अपने लंबे जुड़ाव और इसके प्रारम्भिक वर्षों को स्मरण करते हुए कहा कि वैश्विक चुनौतियों और नीतिगत जटिलताओं के बढ़ने के साथ-साथ थिंक टैंकों की भूमिका में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। उन्होंने बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अपने शोध कार्यों के दायरे को निरंतर व्यापक बनाने के लिए आरआईएस की प्रशंसा की। इस अवसर पर आरआईएस की शासी परिषद के सदस्य डॉ. शेषाद्रि चारी ने कहा कि पिछले वर्षों में वैश्विक परिदृश्य में आए व्यापक परिवर्तनों के बीच आरआईएस एक प्रभावशाली नीति थिंक टैंक के रूप में उभरा है। उन्होंने समकालीन विकासात्मक चुनौतियों के समाधान और रणनीतिक नीति विमर्श को दिशा देने में संस्थान की बढ़ती प्रासंगिकता को रेखांकित किया। सुश्री अपर्णा राय, संयुक्त सचिव (पीपी एंड आर) , विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, ने अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं तथा वैश्विक दक्षिण के देशों को नीति-समर्थन प्रदान करने में आरआईएस के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि समावेशिता, समानता, दक्षिण-दक्षिण सहयोग और सतत विकास जैसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं को नीति विमर्श में स्थापित करने में आरआईएस की भूमिका उल्लेखनीय रही है, जो आज वैश्विक शासन व्यवस्था में और अधिक महत्वपूर्ण बन गई हैं।

          इससे पूर्व आरआईएस के महानिदेशक प्रोफेसर सचिन कुमार शर्मा ने 1983 में संस्थान की स्थापना से लेकर अब तक की यात्रा का विस्तृत उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एवं राजनीतिक वार्ताओं की जटिलताओं से प्रभावी ढंग से निपटने हेतु विश्लेषणात्मक और नीतिगत सहयोग प्रदान करने के उद्देश्य से आरआईएस की स्थापना की गई थी। चार दशकों से अधिक की यात्रा का उल्लेख करते हुए प्रोफेसर शर्मा ने कहा कि बहुपक्षीय संस्थाओं में बढ़ते विखंडन, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और जटिल वैश्विक चुनौतियों के इस दौर में आरआईएस की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। उन्होंने वैश्विक दक्षिण की विकासात्मक आकांक्षाओं को आगे बढ़ाने तथा उच्च गुणवत्ता वाले नीति अनुसंधान के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता दोहराई। 44वें स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत आरआईएस ने “कृषि परिवर्तन हेतु भारत-अफ्रीका साझेदारी को सुदृढ़ बनाना” विषय पर एक सम्मेलन का भी आयोजन किया। यह सम्मेलन दक्षिण (DAKSHIN) – ग्लोबल साउथ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, आरआईएस तथा इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (आईसीआरआईसैट) के सहयोग से आयोजित किया गया। सम्मेलन में देश-विदेश के नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, विकास विशेषज्ञों, उद्योग प्रतिनिधियों और कृषि वैज्ञानिकों ने भाग लिया। सम्मेलन में सतत कृषि प्रणालियों, जलवायु-अनुकूल कृषि, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृषि-स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र तथा कृषि  परिवर्तन के क्षेत्र में भारत-अफ्रीका सहयोग को सुदृढ़ बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया। तकनीकी सत्रों और उच्चस्तरीय पैनल चर्चा के माध्यम से प्रतिभागियों ने अनुभवों और सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान किया, जिससे अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण में समावेशी, सतत एवं प्रौद्योगिकी-संचालित कृषि विकास को बढ़ावा देने की दिशा में नई संभावनाएँ सामने आईं।

स्थापना दिवस समारोह ने पिछले चार दशकों में आरआईएस की उपलब्धियों तथा विकास, आर्थिक सहयोग और वैश्विक शासन से जुड़े नीति विमर्श को दिशा देने में उसकी निरंतर भूमिका पर विचार करने का अवसर प्रदान किया। कार्यक्रम का समापन आरआईएस के प्रोफेसर डॉ. प्रबीर डे द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने सभी विशिष्ट वक्ताओं, अतिथियों, विद्वानों, सहयोगी संस्थानों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की सफलता में उनके योगदान की सराहना की।

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