चौथा अक्षर /नई दिल्ली
लगता है दिल्ली पुलिस की इंसानियत पूरी तरह मर चुकी है। आज के मंहगाई के दौर में एक गरीब इंसान मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार और अपने बच्चों को एक अच्छी जिंदगी देने के लिए दिन रात मेहनत मजदूरी करता है लेकिन समाज में इस प्रकार के पुलिस वाले उसके साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार करते हैं कि वह गरीब इंसान अपनी रोजी रोटी पर हुए ऐसे अमानवीय व्यवहार से ऐसे पुलिस वालों को न चाहते हुए भी बद्दुआ देने पर मजबूर हो जाते हैं। गरीब इंसान इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता अब यह बेचारा रो रहा है इसके रोने से इसकी तड़प साफ झलक रही है लेकिन इन पुलिस वालों पर इसके रोने का कोई असर नहीं पड़ेग।

इस वीडियो को वहां पुलिस के जो आला अधिकारी हैं या वहां के जो नेता हैं उनको एक बार देखना चाहिए और इस विषय के बारे में सोचना चाहिए की गरीब है वो किसी का हक नहीं मार रहा है वह मेहनत करके कमा रहा है ताकि वह अपने परिवार को एक अच्छी जिंदगी दे सके उसके बच्चे भी एक अच्छी जिंदगी जी सके। वह बेचारा गरीब दुकानदार कॉलोनी के पास मात्र 2 घंटे के लिए खाने का ठेला लगाता था जिसे पुलिस वाले ने उठाकर फेंक दिया उसे कह भी सकते थे कि अपना ठेला हटा लो लेकिन तमाम मिन्नतों के बावजूद किसी गरीब इंसान का बना बनाया खाना फेंकना क्या अच्छी बात है| बेचारा दुकानदार फुट फुटकर रो रहा जिसका सपोर्ट में पूरी कॉलोनी के लोग खड़े हैं पर पुलिस वालो को किसी का डर भय नहीं है ये देश के रक्षक नहीं भक्षक बन चुके है जिन्हें आज आम जनता से कोई फर्क नहीं पड़ता और अपने वर्दी का धौस दिखाते हैं और आम जनता को परेशान करते हैं और इंसान दो वक्त के खाने के लिए 12 घंटे की नौकरी करता है उसी अनाज का आपमन कर रही है। दिल्ली पोलिस जिन्हें जरा भी शर्म नहीं है जिस खाने को आज जिस तरह से लात मारकर फेक रहा है उपर वाला एक दिन उसे भी अगर उस खाना को खाने के लिए मोहताज बना देगा तभी समझ में आयेग।गरीबों की हाय बददुआ कभी नहीं लेना चाहिए क्यूंकि दुआ तो तुम दान पुत्र करके कमा लोगो लेकिन बददुआ तो पीड़ित व्यक्ति अपने दुखित अंतर आत्मा से देता है।






