अखिलेश अखिल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आने का दावा किया गया है। तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा है कि पार्टी के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र देकर भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने का फैसला किया है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए अब तक का सबसे बड़ा संसदीय झटका माना जाएगा।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक टीएमसी नेतृत्व की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में दावों और वास्तविक स्थिति को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि लोकसभा में टीएमसी के करीब 20 सांसदों ने सामूहिक रूप से एनडीए का समर्थन करने का निर्णय लिया है और इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष को लिखित सूचना दी जा चुकी है। उनके अनुसार यह फैसला लंबे विचार-विमर्श और आपसी सहमति के बाद लिया गया। दस्तीदार का कहना है कि पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और राज्य के विकास की जरूरतों को देखते हुए सांसदों ने यह कदम उठाया है। उन्होंने यह भी कहा कि बंगाल की जनता के जनादेश का सम्मान करते हुए सांसदों ने अपने भविष्य की राजनीतिक दिशा तय की है।
दलबदल कानून का सवाल
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दलबदल विरोधी कानून है। संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत यदि किसी दल के सांसद या विधायक दल छोड़ते हैं, तो उनकी सदस्यता पर खतरा पैदा हो सकता है। लेकिन यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य एक साथ अलग होने का फैसला करते हैं, तो स्थिति अलग हो जाती है। लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं। दो-तिहाई संख्या लगभग 19 सांसदों की बनती है। काकोली घोष दस्तीदार का दावा है कि उनके साथ 20 सांसद हैं। इसलिए उनका तर्क है कि दलबदल कानून की बाधा उन पर लागू नहीं होगी। हालांकि अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही तय होगा। केवल दावा कर देने भर से कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती।
ममता बनर्जी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
ममता बनर्जी लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी एकता की प्रमुख आवाजों में रही हैं। लोकसभा में टीएमसी की मजबूत उपस्थिति उनकी राष्ट्रीय भूमिका को बल देती रही है। यदि बड़ी संख्या में सांसद वास्तव में एनडीए के साथ चले जाते हैं, तो इसका असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विपक्षी राजनीति की व्यापक तस्वीर पर भी पड़ेगा।विशेष रूप से ऐसे समय में जब विपक्षी दल ‘इंडिया’ गठबंधन के भविष्य और रणनीति पर विचार कर रहे हैं, टीएमसी में किसी बड़े विभाजन की खबर राजनीतिक समीकरण बदल सकती है।
क्या पहले से थे असंतोष के संकेत?
पिछले कुछ समय से टीएमसी के भीतर असंतोष की खबरें आती रही हैं। पार्टी के कुछ नेताओं ने संगठनात्मक फैसलों और नेतृत्व की शैली को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल भी उठाए थे। कुछ नेताओं के इस्तीफे और बयानों ने यह संकेत दिया था कि पार्टी के अंदर सब कुछ सामान्य नहीं है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सांसदों के बीच वास्तव में कोई बड़ा समूह तैयार हुआ है, तो यह अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं होगी। इसके पीछे लंबे समय से चल रही राजनीतिक और संगठनात्मक असहमति हो सकती है।
भाजपा के लिए क्या मायने?
यदि टीएमसी के सांसदों का कोई बड़ा वर्ग एनडीए का समर्थन करता है, तो यह भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से बड़ी सफलता होगी। पश्चिम बंगाल में भाजपा पिछले कई वर्षों से खुद को टीएमसी के प्रमुख विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश करती रही है।संसद के भीतर टीएमसी की ताकत कमजोर होने से भाजपा को विपक्षी राजनीति के एक महत्वपूर्ण स्तंभ को कमजोर करने का अवसर मिल सकता है। साथ ही, बंगाल की राजनीति में भी इसका संदेश दूर तक जाएगा।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में 20 सांसदों ने औपचारिक रूप से एनडीए का समर्थन किया है। अभी तक सभी कथित सांसदों की सूची सार्वजनिक नहीं हुई है। न ही लोकसभा सचिवालय की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने आई है। इसके अलावा टीएमसी नेतृत्व की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। यदि पार्टी इस दावे को चुनौती देती है या सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करती है, तो मामला और जटिल हो सकता है।
आने वाले दिनों में संसद, लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और टीएमसी नेतृत्व की प्रतिक्रियाएं इस विवाद की दिशा तय करेंगी। यदि दावों की पुष्टि होती है, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति निकलती है, तो तस्वीर अलग होगी।फिलहाल इतना स्पष्ट है कि काकोली घोष दस्तीदार के दावे ने दिल्ली से कोलकाता तक राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह दावा वास्तविक संसदीय पुनर्संरेखण का संकेत है या फिर राजनीतिक संघर्ष का एक नया अध्याय।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)






