श्याम लाल शर्मा
20 जुलाई से 13 जुलाई तक चलने वाले लोकसभा के मानसून सत्र में सदन के अंदर और बाहर हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सदन के अंदर नहीं आ रहे हैं उनकी अनुपस्थिति के चलते लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में गतिरोध बना हुआ है।जिसके चलते सदन के समक्ष अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पा रही।लेकिन सरकार अपनी चालबाजियों से बाज नहीं आ रही है तकरीबन हर रोज दोनों सदनों में हो रहे शोर-शराबे का लाभ उठाकर सरकार चालाकी से शासकीय विधेयक पारित कर रही है। यह संसदीय परम्परा के विपरीत है कि जिन मुद्दों पर प्रतिपक्ष चर्चा चाहता है, उसे सत्ता पक्ष चालाकीपूर्वक टाल रहा है और दूसरी ओर बिना बहस कराये अपनी मर्जी व आवश्यकता के विधेयकों को मंजूर कर कानून रूप दे रहा है।आज देश के सामने जो बेहद महत्वपूर्ण सवाल हैं, उन्हें टालना किसी भी सूरत में लोकतंत्र के हित में नहीं है। यह सीधे-सीधे सरकार का जवाबदेही से मुकरना है।विपक्ष प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से 20 जुलाई को संसद मार्च करने आ रहे छात्र -छात्राओं पर हुए लाठी चार्ज , आंसू गैस , पैलेट गन का प्रयोग पुलिस ने किसके कहने पर किया इसका जवाब चाह रहे थे साथ ही राम मंदिर चंदा चोरी को लेकर सदन के अंदर और बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो ले लिया और उम्मीद कि जा रही थी कि जंतर-मंतर पर हुए युवाओं एवं छात्रों के प्रदर्शन और उसके पुलिसिया दमन पर सरकार जवाब देगी।लेकिन गृहमंत्री अमित शाह सदन में ही नहीं आ रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि यह प्रदर्शन मई में नीट परीक्षा लीक होने की वजह से पेपर रद्द हो जाने के खिलाफ हुआ था। परीक्षा रद्द होने के चलते देश भर में 20 से अधिक छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या कर ली। करीब डेढ़ माह चले धरना-प्रदर्शन में शामिल लोग 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च करना चाहते थे। उन्हें रोकने के लिये प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने बड़े पैमाने पर बल प्रयोग किया था। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रदर्शन तो बंद हो गया पर प्रदर्शन स्थल पर युवाओं व छात्र-छात्राओं के साथ हुई पुलिस बर्बरता से लोगों में रोष है। केन्द्र सरकार के वादे के विपरीत बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है। कील लगी लाठियां और सादे कपड़ों में पुलिस के साथ ऐसे लोगों ने छात्रों-युवाओं पर कहर बरपाया था जिनके बारे में आरोप है कि वे भाजपा तथा उसके समर्थित संगठनों के कार्यकर्ता थे। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पैलेट गन से घायल युवक को मीडिया के सामने पेश किया तथा प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे युवाओं से भी तस्दीक कराई कि प्रदर्शनकारियों के साथ बर्बरता हुई।
संसद के बाहर और भीतर राहुल गांधी सवाल उठा रहे हैं कि प्रदर्शन में शामिल युवाओं का दमन करने का आदेश किसने दिया? उनके अनुसार गृह मंत्री होने के नाते अमित शाह इसके लिये जिम्मेदार हैं और अगर वे कहते हैं कि उन्हें जानकारी नहीं है कि यह किसके आदेश पर हुआ तो उसका अर्थ है कि वे अयोग्य हैं। दोनों ही मामलों में शाह की जवाबदेही है और उन्हें सदन में आकर जवाब देना चाहिये। पूरा विपक्ष चाहता है कि इस गम्भीर मामले में गृह मंत्री के साथ प्रधानमंत्री को भी संसद में चर्चा कराकर जनता को संतुष्ट करना चाहिये। उन्हें सदनों में आकर उत्तर देने के लिये रोज ही संसद परिसर में विपक्ष द्वारा प्रदर्शन और नारेबाजी की जा रही है। समूचे विपक्ष ने मकर द्वार से गांधी प्रतिमा तक मार्च भी निकाला, ताकि सरकार पर दबाव बने।
इधर यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में भी है, जहां छात्रों पर पुलिस के दमन से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि हिंसक प्रतिक्रिया कभी समाधान नहीं हो सकती, बल्कि इससे स्थिति और बिगड़ती है। उन्होंने कहा, ‘सबसे बड़ी ताकत लोगों की बात सुनना है। यह समझना जरूरी है कि वे क्या कह रहे हैं और किस वजह से आंदोलन कर रहे हैं।’ मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि शक्तिशाली राज्य की ओर से अत्यधिक सख्ती बरतने से स्थिति और बिगड़ सकती है। उन्होंने कहा कि मामलों को वापस लेने का निर्णय संभवत: इसी सोच के साथ लिया गया होगा। उन्होंने कहा, ‘ये युवा हैं। इन्हें उचित सलाह और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। राज्य की ओर से अनावश्यक आक्रामकता स्थिति को और हिंसक बना सकती है। इससे बचना जरूरी है।’
सुप्रीम कोर्ट भी मान रहा है कि आक्रामकता अनावश्यक है। वैसे नीट तथा सीजेपी के उपरोक्त प्रदर्शन के अलावा कई और ऐसे मुद्दे हैं जिन पर देश की सबसे बड़ी पंचायत में सरकार को जवाब देना चाहिये। अयोध्या के राममंदिर में चंदा चोरी का मामला, एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल-डीज़ल की बिक्री, कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति, असम की बाढ़, ऑपरेशन सिंदूर के मामले में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा शहीदों की संख्या को लेकर संसद के पिछले एक सत्र में झूठ बोलना (बताया गया था कि कोई नुकसान नहीं हुआ पर हाल ही में स्वयं सरकार ने बताया है कि देश के 6 जवान शहीद हुए) आदि।
संसद सत्र से अनुपस्थित रहने का मोदी का पहले से रिकॉर्ड रहा है। उनके 12 वर्षीय कार्यकाल में अनेक ऐसे अवसर आये जब वे संसदीय बैठकों में उपस्थित रहने की बजाय कभी विदेश यात्रा पर निकल गये थे या चुनावी रैलियों को सम्बोधित करते रहे अथवा रोड शो कर रहे थे। खासकर राहुल गांधी सदन में आते हैं तो नरेन्द्र मोदी गायब ही हो जाते हैं। ऐसे में वे सदनों को अक्सर अमित शाह, राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आदि के भरोसे छोड़ जाते हैं। लेकिन अमित शाह पर जब से पुलिस बर्बरता का आरोप लगा है, तभी से वे भी संसद से गायब हैं। मोदी तो आधी रात को रीलें बनाते नज़र आते हैं। यहां तक कि सोमवार को आंध्रप्रदेश में हजारों लोगों के सामूहिक नृत्य का आनंद लेते हुए भी दिखे, लेकिन गृह मंत्री का कोई अता-पता नहीं है। यानी ‘एक अकेला सब पर भारी तथा ’56 इंची सीना’ होने का दावा करने वाले मोदी और ‘चाणक्य’ कहलाने वाले अमित शाह दोनों ही विपक्ष का जवाब देने से घबरा रहे हैं। इन दोनों की अनुपस्थिति जनता को सोशल मीडिया पर और विपक्ष को संसद परिसर में भाजपा सरकार का मजाक उड़ाने के अवसर दे रही है। इस बीच सरकार ने लाभ उठाते हुए जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र संशोधन विधेयक, पेपर लीक विरोधी कानून आदि बगैर चर्चा के पारित करा लिये। कहा जा रहा है कि यदि सभी शासकीय काम पूरे हो जाएंगे तो संसद का समय पूर्व सत्रावसान भी सम्भव है। जवाबदेही और संवाद से बचना इस सरकार की फ़ितरत और ज़रूरत दोनों ही है और सरकार जवाबदेही से भाग रही है।






